36 वर्षों की सेवा और 26 साल पीईएस अधिकारी के रूप में कार्यकाल के बावजूद पदोन्नति न मिलने से नाराज़गी, शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर प्रश्न
टिहरी गढ़वाल, 23 सितम्बर 2025 | रिपोर्ट @ सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’
उत्तराखंड के शिक्षा विभाग से जुड़ी बड़ी खबर सामने आई है। मुख्य शिक्षा अधिकारी (सीईओ) टिहरी, एस.पी. सेमवाल ने पदोन्नति न मिलने से नाराज़ होकर अपना इस्तीफ़ा सचिव शिक्षा को भेज दिया है।
यह केवल एक इस्तीफ़ा नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा विभाग की कार्यशैली और प्रशासनिक दृष्टिकोण पर सवाल खड़े करता है।
✔ इस्तीफ़ा क्यों दिया?
एस.पी. सेमवाल ने 36 वर्षों की उत्कृष्ट सेवाएँ दी हैं, जिनमें से 26 वर्ष उन्होंने प्रोविंशियल एजुकेशन सर्विस (पीईएस) अधिकारी के रूप में प्रधानाचार्य से लेकर मुख्य शिक्षा अधिकारी तक जिम्मेदारियों को निभाया। अपने कार्यकाल में उन्होंने शिक्षा सुधार, नवाचार और प्रशासनिक ईमानदारी की मिसाल कायम की।
फिर भी, पदोन्नति के अभाव और लंबे समय तक एक ही पद पर जमे रहने की स्थिति ने उन्हें आहत किया। उनका इस्तीफ़ा शिक्षा व्यवस्था की खामियों को उजागर करता है और यह संदेश देता है कि ईमानदार और कर्मठ अधिकारियों को भी उचित सम्मान नहीं मिल पा रहा।
✔ शिक्षा विभाग पर सवाल
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद शिक्षा क्षेत्र से बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन अब तक अधिकतर निराशा ही हाथ लगी।
- शिक्षकों के पद लंबे समय से खाली पड़े हैं।
- प्रधानाध्यापक और प्रधानाचार्य की नियुक्तियों में निरंतर देरी होती रही है।
- पिछले 25 वर्षों से उठापटक का सिलसिला जारी है।
मुख्य शिक्षा अधिकारी का इस्तीफा देना शिक्षा विभाग की व्यवस्था और उसके निर्णयों पर गहरा प्रश्नचिह्न लगाता है।
✔ एस.पी. सेमवाल की कार्यशैली
- वे विद्वान, नवाचारी और दृढ़ प्रशासक के रूप में जाने जाते हैं।
- बच्चों की शिक्षा के प्रति गहरी संवेदनशीलता रखते हैं।
- कड़े लेकिन न्यायप्रिय निर्णय लेने वाले अधिकारी रहे हैं।
- शिक्षकों व कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए हमेशा अग्रसर रहे।
ऐसे अधिकारी का सेवानिवृत्ति से ठीक पहले इस्तीफा देना शिक्षा मिशन पर चोट जैसा माना जा रहा है।
✔ क्या इस्तीफा स्वीकार होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्तर के अधिकारी का त्यागपत्र इतनी आसानी से स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके लिए लंबी प्रक्रिया होती है। विभाग और शासन से अपेक्षा है कि वे इस इस्तीफ़े को न स्वीकारें और समय रहते उन्हें पदोन्नति एवं सम्मान दें।
यदि यह इस्तीफ़ा स्वीकार कर लिया गया, तो यह शिक्षा विभाग के लिए बड़ी क्षति होगी। इससे न केवल शिक्षा का स्तर गिरेगा, बल्कि शिक्षकों और अधिकारियों का मनोबल भी कमजोर होगा।
शिक्षा किसी भी समाज और राज्य की रीढ़ होती है। एक कुशल और ईमानदार शिक्षा प्रशासक का मनोबल टूटना पूरे तंत्र के लिए चेतावनी है।
इस घटना ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था वास्तव में योग्य अधिकारियों और शिक्षकों को उनका न्यायोचित सम्मान और अवसर दे पा रही है?
Disclaimer: यह लेखक के निजी विचार हैं।
