देवीथात का गोठी मेला: जहां आस्था, लोकसंस्कृति और हिमालयी प्रकृति का होता है दिव्य संगम
लोक संस्कृति विशेष- श्रावण मास की 15 गते आयोजित होने वाला प्राचीन गोठी मेला सदियों पुरानी देव परंपराओं, लोकविश्वास और सामाजिक समरसता का जीवंत प्रतीक
नई टिहरी।
उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान केवल उसके पर्वत, नदियां और देवालय ही नहीं, बल्कि सदियों से जीवित उसकी लोक परंपराएं भी हैं। ऐसी ही एक अनूठी और प्राचीन परंपरा है विकासखंड जौनपुर की पट्टी ईडवालस्यूँ स्थित देवीथात का गोठी मेला, जो प्रत्येक वर्ष श्रावण मास की 15 गते श्रद्धा, आस्था और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ आयोजित किया जाता है।
यह मेला केवल धार्मिक आयोजन भर नहीं है, बल्कि लोक संस्कृति, प्रकृति, पशुपालन, कृषि और सामाजिक एकता का अद्भुत संगम भी है। स्थानीय मान्यता है कि इसी मेले के साथ क्षेत्र में पर्व-त्योहारों के शुभारंभ का क्रम भी प्रारंभ होता है।
मां गौरजा और भगवान नागराज की दिव्य लोकगाथा
स्थानीय लोकमान्यताओं के अनुसार देवीथात में मां गौरजा का दिव्य निवास है, जबकि भगवान नागराज का सिद्धधाम प्रसिद्ध नागटिब्बा माना जाता है।
किंवदंती है कि भगवान नागराज अपनी बहन मां गौरजा से मिलने वर्ष में दो बार—
- बैसाख मास की द्वितीया, तथा
- भाद्रपद में जन्माष्टमी के उपरांत
दिव्य घोड़ी पर सवार होकर नागटिब्बा से देवीथात पहुंचते हैं।
क्षेत्र के बुजुर्ग बताते हैं कि प्राचीन समय में कई लोगों को इस दिव्य मिलन के दर्शन भी हुए थे। वर्तमान में यह परंपरा आज भी लोकविश्वास के अनुसार निरंतर जारी है, किंतु इसके प्रत्यक्ष दर्शन किसी को नहीं होते। यही विश्वास इस देवस्थल को विशेष आध्यात्मिक महत्व प्रदान करता है।
गोठी मेले की अनूठी परंपरा
गोठी मेले की सबसे विशिष्ट परंपरा क्षेत्र के ग्वाल-बालों से जुड़ी हुई है।
मेले के दिन बुग्यालों में स्थानीय बालक मिट्टी से भगवान नागदेवता का स्वरूप निर्मित करते हैं और उन्हें भगवान श्रीकृष्ण के रूप में श्रद्धापूर्वक पूजते हैं।
पूजन के दौरान—
- केदार पाती
- दही
- मक्खन
- धूप
- दीप
- पुष्प
- तथा प्रसाद
अर्पित कर पूरे क्षेत्र की सुख-समृद्धि, उत्तम कृषि, पशुधन की उन्नति तथा जनकल्याण की कामना की जाती है।
सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और आत्मीयता के साथ निभाई जा रही है, जिसने इसे उत्तराखंड की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर बना दिया है।
इस वर्ष भी श्रद्धा और उल्लास के साथ सजा गोठी मेला
पूर्व सैनिक एवं ग्राम प्रधान भटवाड़ी सुनील सेमवाल ने बताया कि इस वर्ष 31 जुलाई को गोठी मेले का आयोजन पूरे पारंपरिक उत्साह एवं धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुआ।
मेले में पट्टी ईडवालस्यूँ, जौनपुर क्षेत्र तथा दूर-दराज के अनेक गांवों से श्रद्धालु पहुंचे और मां गौरजा एवं भगवान नागराज के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
उन्होंने कहा कि अपनी विशिष्ट लोक परंपराओं, सामाजिक समरसता और धार्मिक आस्था के कारण यह मेला आज भी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान बना हुआ है। विशेष बात यह है कि नई पीढ़ी भी बढ़-चढ़कर इस आयोजन में भागीदारी निभा रही है, जिससे लोकसंस्कृति की निरंतरता बनी हुई है।
प्राकृतिक सौंदर्य का अनुपम धाम
धार्मिक महत्व के साथ-साथ देवीथात प्राकृतिक सौंदर्य का भी अद्भुत केंद्र है।
यहां से—
- नागराज का सिद्धधाम नागटिब्बा
- कोट श्रीकोट
के मनोहारी दर्शन होते हैं।
देवदार, बांज और बुरांश के घने जंगलों से आच्छादित यह क्षेत्र श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति के साथ हिमालय की अनुपम प्राकृतिक छटा का भी साक्षात्कार कराता है।
लोकसंस्कृति को नई पीढ़ी से जोड़ता आयोजन
तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश और आधुनिक जीवनशैली के बीच देवीथात का गोठी मेला आज भी लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य कर रहा है।
यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था का उत्सव नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, देव परंपरा, सामुदायिक एकता, प्रकृति संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत दस्तावेज है।
स्थानीय समाज ने अपनी सामूहिक सहभागिता, विश्वास और परंपराओं के बल पर इस धरोहर को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखा है। यही कारण है कि देवीथात का गोठी मेला आज भी उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान के रूप में अपनी विशिष्ट गरिमा बनाए हुए है।
