भगवान की बांसुरी है आध्यात्म और संस्कृति का प्रतीक : आचार्य द्वारिका
चंबा, ✍️ सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’।
सुमन कॉलोनी, चंबा में चल रहे श्रीमद्भागवत महापुराण सप्ताह ज्ञान यज्ञ के पांचवें दिन श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा श्रवण के लिए पहुंचे।
व्यास गद्दी पर आसीन आचार्य द्वारिका प्रसाद बहुगुणा ने मधुर स्वर और गढ़वाली भाषा में शास्त्रों के रोचक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी केवल वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि आध्यात्म और संस्कृति का गूढ़ प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि बांसुरी का खोखलापन निर्विकारता और निस्वार्थता का प्रतीक है। जैसे बांसुरी में मोह, वासना और अहंकार का कोई स्थान नहीं होता, वैसे ही मनुष्य को भी जीवन में इन दूषित भावनाओं को त्यागकर निर्मल बनना चाहिए।
आचार्य बहुगुणा ने बताया कि भगवान की बंसी में मधुरता, संयम और सकारात्मक ऊर्जा निहित है। यह केवल संगीत नहीं, बल्कि प्रेम, शांति और ध्यान का माध्यम है, जो मानव को विकारों से मुक्त करता है। बांसुरी की धुन में योग का सार और भक्ति का आधार समाया है।
उन्होंने कहा कि बांसुरी का स्वर संतुलन, नियंत्रण और वास्तु दोष निवारण का भी द्योतक है। भगवान श्रीकृष्ण की बंसी हमें सिखाती है कि जीवन में मधुरता और संयम बनाए रखते हुए हर परिस्थिति में सकारात्मक रहना चाहिए।
🌼 कथा में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
शनिवार को साप्ताहिक बाजार बंदी होने के कारण बड़ी संख्या में व्यापारी वर्ग भी कथा श्रवण के लिए उपस्थित रहा। चंबा नगर और आसपास के गांवों से श्रद्धालु कथा स्थल पहुंचे।
इस अवसर पर नगर पालिका के पूर्व अध्यक्ष विक्रम पंवार, प्रधान जसपाल नेगी, चंडी प्रसाद बिजल्वाण, शिक्षक संघ के पूर्व महामंत्री राजेंद्र बहुगुणा, धीरेंद्र पुंडीर, सूरत चंद रमोला, महेश पैन्यूली, मार्कंडेय बडोनी, राजेंद्र नकोटी, शोभन सिंह रावत समेत अनेक गणमान्य नागरिक एवं मातृशक्ति उपस्थित रहे।
कथा का आयोजन जयपाल गुसाईं द्वारा अपने माता-पिता स्व. छंछरी देवी एवं स्व. रंणजोर सिंह गुसाईं की पुण्य स्मृति में एकोदिष्ट श्राद्ध के अवसर पर कराया जा रहा है।
