त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव 2025
टक्कर दो बेटियों की नहीं, दो राष्ट्रीय दलों की प्रतिष्ठा का सवाल
त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की सबसे हॉट सीट: भुत्सी
टिहरी, सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’: टिहरी गढ़वाल के जौनपुर ब्लॉक की भुत्सी सीट इस बार त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव 2025 में चर्चा का केंद्र बनी हुई है। यहां की लड़ाई न सिर्फ दो प्रत्याशियों के बीच है, बल्कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुकी है।
सरिता बनाम सीता: सिर्फ़ नाम नहीं, विचारधारा की जंग
सीट की वर्तमान परिस्थिति और इतिहास दिलचस्प है। रिटर्निंग अफसर द्वारा पहले सीता देवी का नामांकन रद्द कर दिया गया था, जिससे सरिता नकोटी निर्विरोध विजेता घोषित हो गईं। लेकिन सीता देवी ने न्यायालय की शरण ली और माननीय उच्च न्यायालय ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए नामांकन बहाल करने और चुनाव चिन्ह देने का निर्देश दिया।
कांग्रेस ने इस मौके को लपकते हुए निर्दलीय सीता देवी को समर्थन दे दिया, जो अब भाजपा प्रत्याशी सरिता नकोटी के सामने चुनौती बनकर खड़ी हैं।
भाजपा बनाम कांग्रेस: साख या संजीवनी?
अब यह चुनाव केवल दो व्यक्तियों के बीच नहीं, बल्कि दो राष्ट्रीय दलों की राजनीतिक भविष्य की बुनियाद बन चुका है। अगर सीता देवी जीतती हैं तो कांग्रेस के लिए यह राजनीतिक संजीवनी होगी, वहीं भाजपा के लिए यह हार एक बड़ा झटका मानी जाएगी। अगर सरिता नकोटी जीतती हैं तो भाजपा की प्रतिष्ठा बची रहेगी और कांग्रेस को एक बार फिर झटका लगेगा।
राजनीति की चालें: साम, दाम, दंड, भेद
चुनावी रणभूमि में पारंपरिक हथकंडे जैसे भोज, दावत, शराब, जातिवाद, पंथवाद, और रिश्तेदारी आधारित वोट बैंक देखने को मिलते हैं। यह भी देखने में आता है कि बुद्धिजीवी वर्ग अक्सर मूकदर्शक बनकर रह जाता है। कुछ लोकप्रिय लोग चुनावी मैदान से दूरी बनाकर रखते हैं, तो कुछ अपने निजी स्वार्थों के कारण मौन रहते हैं।
महिला शक्ति का प्रभाव: असली निर्णायक
मतदाता वर्ग में मातृशक्ति की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है। वे न दावत में जाती हैं, न किसी पार्टी का हिस्सा बनती हैं। वे अपने विवेक से मतदान करती हैं, और अक्सर वही निर्णय अंतिम साबित होता है। इस चुनाव में भी जीत-हार का निर्णय मातृशक्ति ही करेगी।
इतिहास की गवाही: सकलाना की क्रांतिकारी परंपरा
सकलाना क्षेत्र ने स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आज तक अनेक बलिदान और क्रांतिकारी विचारधाराओं को जन्म दिया है। नागेंद्र सकलानी और जगतराम सेमवाल जैसे नेताओं ने सिद्ध किया है कि यहां के लोग विचारों से समझौता नहीं करते। आज भी वही परंपरा जीवित है।
निष्कर्ष: चुनाव परिणाम से आगे का सवाल
प्रश्न केवल जीत-हार का नहीं है, बल्कि इस बात का है कि विजन क्या है? क्षेत्रीय विकास के लिए क्या योजनाएं हैं? मतदाता अब सजग है और वादों से आगे जाकर काम की अपेक्षा रखता है। चुनाव 24 जुलाई को होगा और नतीजे 31 जुलाई को आएंगे। जो भी जीते, क्षेत्रीय विकास की प्राथमिकता सबसे अहम होनी चाहिए।
