लोकचिंतन से विकास की ओर: रानीचौरी की संभावनाओं पर गंभीर विमर्श का समय
जनसहभागिता और दूरदर्शी विकास की अवधारणा के बीच रानीचौरी क्षेत्र की संभावनाओं पर गंभीर विमर्श आवश्यक
भारतीय समाज की सबसे बड़ी शक्ति उसका लोकमानस है। यही लोकमानस हमारी संस्कृति, परंपराओं, आस्थाओं और सामाजिक मूल्यों का वास्तविक संरक्षक रहा है। इतिहास साक्षी है कि समय-समय पर अनेक साम्राज्य आए, शासन बदले, कानून बने और बड़े-बड़े विद्वानों ने अपने तर्कों की प्रतिष्ठा स्थापित करने का प्रयास किया, किंतु अंततः वही विचार टिके, जिन्हें लोकजीवन ने स्वीकार किया। लोक किसी व्यक्ति विशेष के अहंकार का नहीं, बल्कि समष्टि के अनुभवों का सम्मान करता है। यही कारण है कि लोकमान्यता किसी तर्क प्रणाली की मोहताज नहीं होती; वह पीढ़ियों के अनुभव, विश्वास और जीवन-दर्शन से निर्मित होती है।
समय बदलता है तो तर्क भी बदल जाते हैं, लेकिन समाज की आत्मा उन मूल्यों में जीवित रहती है जो उसे अपने पूर्वजों से विरासत में प्राप्त हुए हैं। मनुष्य कभी अकेला नहीं रहा। उसका जीवन प्रकृति, समाज, पशु-पक्षियों और समस्त सृष्टि के साथ सह-अस्तित्व की भावना पर आधारित है। यही भारतीय दर्शन “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” का मूल संदेश भी है।
आज जब समाज तीव्र प्रतिस्पर्धा, स्वार्थ और भौतिकता की दौड़ में उलझता जा रहा है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि व्यक्ति अपने जीवन का कुछ समय और सामर्थ्य समाज के लिए भी समर्पित करे। केवल व्यक्तिगत उन्नति ही जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकती। वास्तविक संतोष उसी कर्म में निहित है, जिससे समाज, गांव, क्षेत्र और राष्ट्र का हित जुड़ा हो। धन और पद के लिए किए गए समझौते क्षणिक लाभ अवश्य दे सकते हैं, किंतु लोककल्याण के लिए किया गया कार्य पीढ़ियों तक स्मरणीय रहता है।
इसी व्यापक लोकहित की भावना के साथ वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य श्री हर्षमणि बहुगुणा ने रानीचौरी क्षेत्र के विकास को लेकर कुछ महत्वपूर्ण सुझाव सार्वजनिक किए हैं। उनके विचार केवल किसी स्थान विशेष के विकास का आग्रह नहीं हैं, बल्कि दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों के संतुलित विकास पर गंभीर विमर्श का आमंत्रण भी हैं।
रानीचौरी परिसर के समीप लगभग 165 हेक्टेयर भूमि उपलब्ध है, जो वर्तमान में औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, भरसार के अधीन है। वर्तमान में वहां केवल वानिकी संकाय संचालित है। यदि उपलब्ध भूमि और भविष्य की आवश्यकताओं का तकनीकी एवं प्रशासनिक दृष्टि से परीक्षण किया जाए, तो यह विचार किया जा सकता है कि क्या इस परिसर में चिकित्सा शिक्षा (विशेषकर मेडिकल कॉलेज) जैसी महत्वपूर्ण परियोजना की भी संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं। इससे सरकार को नई भूमि अधिग्रहण की जटिल प्रक्रिया से राहत मिल सकती है और उपलब्ध संसाधनों का समुचित उपयोग संभव हो सकता है। स्वाभाविक है कि ऐसे किसी भी प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय तकनीकी अध्ययन, वित्तीय व्यवहार्यता, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) के मानकों तथा शासन की नीति के अनुरूप ही लिया जा सकता है।
इसी प्रकार वर्षों से लंबित रानीचौरी को राष्ट्रीय राजमार्ग-94 (वर्तमान एनएच-34) से जोड़ने वाली लगभग चार किलोमीटर सड़क भी विकास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि इस मार्ग का निर्माण शीघ्र प्रारंभ होता है तो यह केवल रानीचौरी ही नहीं, बल्कि गजा, नकोट और नई टिहरी क्षेत्र के यातायात दबाव को भी कम कर सकता है। यह सड़क भविष्य में एक प्रभावी बाईपास के रूप में भी उपयोगी सिद्ध हो सकती है। इसलिए इस परियोजना की प्रगति पर गंभीरता से विचार अपेक्षित है।
विकास केवल सड़क, भवन और संस्थानों तक सीमित नहीं होता। किसी भी क्षेत्र का वास्तविक विकास तब माना जाता है जब वहां दिव्यांगजन, वरिष्ठ नागरिक, महिलाएं, युवा और अंतिम पंक्ति का व्यक्ति भी समान अवसर प्राप्त करे। रानीचौरी जैसे क्षेत्रों में दिव्यांगजन की आवश्यकताओं, सार्वजनिक सुविधाओं, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और रोजगार के अवसरों पर भी गंभीर चिंतन समय की मांग है।
यह प्रश्न केवल रानीचौरी का नहीं, बल्कि उत्तराखंड के अनेक पर्वतीय क्षेत्रों का है। क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए इन्हें उसी उपेक्षित स्थिति में छोड़ देंगे, या फिर योजनाबद्ध विकास, दूरदर्शी सोच और जनसहभागिता के माध्यम से नई संभावनाओं का द्वार खोलेंगे?
लोकचिंतन तभी सार्थक होता है, जब वह संवाद को जन्म दे। किसी भी विकास प्रस्ताव पर मतभेद स्वाभाविक हैं, किंतु संवाद और तथ्यों पर आधारित विमर्श ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। आवश्यकता इस बात की है कि समाज, जनप्रतिनिधि, विशेषज्ञ, प्रशासन और सरकार मिलकर ऐसी विकास योजनाओं पर विचार करें, जो दीर्घकालीन, संतुलित और जनहितकारी हों।
यदि हम अपने व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर समाज के व्यापक हित के लिए सोचने और कार्य करने का संकल्प लें, तो न केवल रानीचौरी, बल्कि सम्पूर्ण उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों का भविष्य अधिक उज्ज्वल और समृद्ध बन सकता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य श्री हर्षमणि बहुगुणा द्वारा व्यक्त विचारों एवं सुझावों के आधार पर संपादकीय शैली में प्रस्तुत किया गया है। इसमें उल्लिखित विकास संबंधी प्रस्ताव, विशेषकर मेडिकल कॉलेज एवं अन्य परियोजनाओं के संदर्भ, सार्वजनिक विमर्श और विचार हेतु हैं। इनका उद्देश्य किसी आधिकारिक निर्णय अथवा सरकारी स्वीकृति का दावा करना नहीं है। किसी भी परियोजना का अंतिम निर्णय संबंधित शासन, प्रशासन, तकनीकी विशेषज्ञों एवं वैधानिक संस्थाओं द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप ही लिया जाएगा।
♦ केदार सिंह चौहान ‘प्रवर’
सम्पादक, सरहद का साक्षी, डिजिटल मीडिया

