गर्व, लोभ और चतुराई की त्रासदी — तालाब किनारे घटी एक पौराणिक घटना
“हस्त मरे कुछ गर्व करे, सर्प मरे सुराई; मनुष्य मरे कुछ लोभ करे, जंबु मरे चतुराई” — एक लोकश्लोक का साहित्यिक विस्तार
तालाब की पौराणिक कथा: जब हाथी का गर्व, सर्प का अहंकार, मनुष्य का लोभ और सियार की चतुराई बने विनाश का कारण
भारतीय लोकपरंपरा के एक प्राचीन श्लोक में छिपे जीवन दर्शन का विस्तृत साहित्यिक पुनर्पाठ
लोकश्लोकों में छिपा जीवन का गहन दर्शन
♦केदार सिंह चौहान ‘प्रवर’
भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी शक्ति उसकी लोकपरंपरा है।
वेद, पुराण, उपनिषद और स्मृतियों के अतिरिक्त भारतीय जनमानस ने जीवन के अनुभवों को लोककथाओं और लोकश्लोकों में भी सुरक्षित रखा है।
गाँवों की चौपालों, संतों की वाणी, और बुजुर्गों की सीख में ऐसे अनेक श्लोक मिलते हैं जो जीवन का गहरा दर्शन प्रस्तुत करते हैं।
ऐसा ही एक श्लोक है—
हस्त मरे कुछ गर्व करे,
सर्प मरे सुराई।
मनुष्य मरे कुछ लोभ करे,
जंबु मरे चतुराई।।
यह श्लोक केवल एक कहानी नहीं है।
यह मनुष्य के चार सबसे बड़े दोषों का चित्रण है—
- गर्व
- अहंकार
- लोभ
- अति-चतुराई
इन चारों दोषों के कारण चार जीवों की मृत्यु होती है —
एक हाथी, एक सर्प, एक मनुष्य और एक सियार।
यह कथा हमें बताती है कि प्रकृति में हर जीव अपने स्वभाव के कारण ही विनाश को प्राप्त होता है।
आज के समय में भी यह कथा उतनी ही प्रासंगिक है जितनी हजारों वर्ष पहले थी।
हिमालय की गोद में बसा वह वन
बहुत समय पहले की बात है।
हिमालय की तलहटी में एक विशाल और घना वन फैला हुआ था।
वह वन केवल पेड़ों का समूह नहीं था, बल्कि एक जीवंत संसार था।
ऊँचे देवदार और साल के वृक्ष आकाश को छूते प्रतीत होते थे।
वसंत ऋतु में जब हवा चलती, तो पत्तों की सरसराहट किसी मधुर वीणा की ध्वनि जैसी लगती।
वन में असंख्य जीव रहते थे—
- हिरणों के झुंड
- जंगली भैंसे
- बंदरों की टोली
- पक्षियों का विशाल संसार
प्रकृति यहाँ अपने पूर्ण वैभव में थी।
वन के मध्य में एक सुंदर तालाब था।
यह तालाब उस पूरे जंगल का जीवन स्रोत था।
सुबह होते ही वहाँ जीवन का उत्सव शुरू हो जाता—
- पक्षियों का मधुर कलरव
- हिरणों का पानी पीना
- बंदरों की शरारतें
और कभी-कभी दूर से हाथियों का दल भी वहाँ आता।
तालाब का जल इतना स्वच्छ था कि उसमें आकाश का प्रतिबिंब दिखाई देता था।
परंतु प्रकृति के इसी शांत स्थल पर एक दिन ऐसी घटना घटी जिसने पूरे जंगल को स्तब्ध कर दिया।
शक्ति का प्रतीक – मत्तगज
उस जंगल में एक विशाल हाथी रहता था।
उसका नाम था मत्तगज।
वह अत्यंत शक्तिशाली था।
जब वह जंगल में चलता, तो धरती काँप उठती।
उसकी सूँड इतनी शक्तिशाली थी कि वह बड़े वृक्षों को भी उखाड़ सकता था।
उसके दाँत सूर्य की किरणों में चमकते थे।
धीरे-धीरे उसकी शक्ति ने उसके मन में गर्व पैदा कर दिया।
वह सोचने लगा—
“इस जंगल में मुझसे शक्तिशाली कोई नहीं।”
जब भी वह तालाब पर आता, अन्य जीव डरकर दूर हट जाते।
यह देखकर उसका अहंकार और बढ़ जाता।
वह मन ही मन कहता—
“यह तालाब मेरा है।
यह जंगल मेरा है।”
लेकिन प्रकृति के नियम अलग होते हैं।
जो स्वयं को सबसे बड़ा समझता है, वह अक्सर अपने विनाश का कारण भी स्वयं बन जाता है।
विष का अभिमान – कालफण
तालाब के किनारे एक पुराना पीपल का वृक्ष था।
उसकी जड़ों के नीचे एक बिल था।
उस बिल में रहता था एक विषैला सर्प।
उसका नाम था कालफण।
कालफण अपने विष पर अत्यधिक गर्व करता था।
वह सोचता—
“मेरे एक डंस से सबसे शक्तिशाली जीव भी मर सकता है।”
एक दिन उसने तालाब पर आते हुए हाथी को देखा।
उसके मन में एक विचार आया—
“यदि मैं इस हाथी को डंस लूँ, तो जंगल में मेरी शक्ति का नाम हो जाएगा।”
यह विचार धीरे-धीरे उसके मन में अहंकार बन गया।
वह उसी अवसर की प्रतीक्षा करने लगा।
लोभ का जाल – शिकारी भैरव
उस जंगल के पास एक छोटा सा गाँव था।
वहाँ एक शिकारी रहता था।
उसका नाम था भैरव।
वह शिकार करके अपना जीवन चलाता था।
एक दिन उसे पता चला कि जंगल में एक विशाल हाथी रहता है जिसके दाँत बहुत कीमती हैं।
यह सुनते ही उसके मन में लोभ जाग उठा।
वह सोचने लगा—
“यदि मैं उस हाथी को मार दूँ, तो उसके दाँत बेचकर बहुत धन कमा सकता हूँ।”
लोभ ने उसकी बुद्धि को ढक लिया।
वह बंदूक लेकर जंगल में निकल पड़ा।
चतुराई का अभिमान – जंबुक
जंगल में एक चालाक सियार भी रहता था।
उसका नाम था जंबुक।
वह अत्यंत चतुर था।
वह मेहनत से अधिक अपनी बुद्धि पर भरोसा करता था।
वह अक्सर दूसरों के शिकार पर निर्भर रहता था।
उस दिन जब वह तालाब के पास पहुँचा, तो उसे लगा कि आज कुछ बड़ा होने वाला है।
नियति का संगम
दोपहर का समय था।
चारों जीव अलग-अलग कारणों से उसी तालाब के पास पहुँच चुके थे—
- हाथी — प्यास बुझाने
- सर्प — शक्ति दिखाने
- मनुष्य — लोभ पूरा करने
- सियार — अवसर खोजने
प्रकृति मानो चारों को एक ही मंच पर ले आई थी।
गर्व और अहंकार की टक्कर
हाथी तालाब पर पहुँचा और पानी पीने लगा।
उसी समय उसका पैर सर्प के बिल के ऊपर पड़ गया।
सर्प ने तुरंत हाथी के पैर में डंस मार दिया।
दर्द से हाथी क्रोधित हो उठा।
उसने जोर से पैर पटका।
सर्प उसके नीचे दब गया।
कुछ ही क्षणों में—
- सर्प मर गया
- हाथी विष के प्रभाव से गिर पड़ा
दोनों की मृत्यु हो गई।
लोभ का अंत
कुछ देर बाद शिकारी वहाँ पहुँचा।
उसने देखा—
एक विशाल हाथी मृत पड़ा है।
उसकी आँखों में लालच चमक उठा।
वह हाथी के दाँत निकालने लगा।
लेकिन दाँत बहुत मजबूत थे।
उसने पत्थर उठाकर जोर से मारा।
पत्थर उछलकर उसके माथे पर लगा।
वह गिर पड़ा।
और कुछ ही क्षणों में उसकी भी मृत्यु हो गई।
चतुराई की विडंबना
अब वहाँ तीन शव पड़े थे—
- हाथी
- सर्प
- मनुष्य
कुछ देर बाद सियार जंबुक वहाँ पहुँचा।
उसकी आँखें चमक उठीं।
लेकिन उसने बंदूक को देखा।
वह उसे हटाने लगा।
जैसे ही उसने बंदूक खींची—
धाँय!
गोली चली और उसके शरीर में लग गई।
उसकी भी मृत्यु हो गई।
प्रकृति का मौन संदेश
शाम हो गई।
तालाब के किनारे चार शव पड़े थे—
- हाथी
- सर्प
- मनुष्य
- सियार
जंगल के जीव दूर खड़े यह दृश्य देख रहे थे।
प्रकृति जैसे मौन होकर कह रही थी—
“अहंकार, लोभ और अति चतुराई — अंततः विनाश का कारण बनते हैं।”
दार्शनिक विश्लेषण : चार मृत्यु, चार चेतावनियाँ
1. शक्ति का गर्व
हाथी अपनी शक्ति के कारण अंधा हो गया।
2. विष का अहंकार
सर्प ने प्रसिद्धि के लिए हाथी को डंस लिया।
3. लोभ का अंधकार
मनुष्य धन के लालच में सावधानी भूल गया।
4. चतुराई का भ्रम
सियार अपनी बुद्धि के अभिमान में मारा गया।
आधुनिक समाज के लिए संदेश
आज भी यह कथा उतनी ही प्रासंगिक है।
आज का मनुष्य—
- पद के गर्व में
- धन के लोभ में
- बुद्धि के अहंकार में
अक्सर अपने विनाश का कारण स्वयं बन जाता है।
उपसंहार
तालाब के किनारे घटी यह घटना हमें जीवन का एक अमर सत्य बताती है।
इसीलिए हमारे पूर्वजों ने कहा—
हस्त मरे कुछ गर्व करे,
सर्प मरे सुराई।
मनुष्य मरे कुछ लोभ करे,
जंबु मरे चतुराई।।
यह श्लोक केवल एक कथा नहीं, बल्कि जीवन का शाश्वत दर्शन है।
