वेद-पुराण, दर्शन, धर्म और संस्कृति का समन्वय—बीएचयू के बाद भारत का दूसरा प्रमुख केन्द्र बनेगा दून विश्वविद्यालय। उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने कहा, यह केन्द्र आधुनिकता और परम्परा के मध्य सेतु का कार्य करेगा।
📍 स्थानः देहरादून
📅 दिनांकः 01 अगस्त 2025
✍️ रिपोर्टः अनुराग चौहान
भारतीय सभ्यता की जड़ें गहराई तक भारतीय दर्शन, धर्म, संस्कृति और अध्यात्म में पैठी हैं। आधुनिक शिक्षा प्रणाली में इन मूल्यों को पुनः स्थान देने का जो प्रयास देशभर में शुरू हुआ है, उसमें उत्तराखण्ड की भूमिका अब और अधिक उल्लेखनीय हो गई है। दून विश्वविद्यालय में प्रस्तावित ‘हिन्दू अध्ययन केन्द्र’ न केवल राज्य की शिक्षा व्यवस्था को एक नई दिशा देगा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय ज्ञान परंपरा को समर्पित शिक्षा का एक स्तम्भ बनेगा।
🔹 आधुनिक शिक्षा में परंपरा का समावेश:
शताब्दियों से भारतीय शिक्षा पद्धति जीवन के आध्यात्मिक, नैतिक और सांस्कृतिक पक्षों को केन्द्र में रखती रही है। परंतु औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली ने इस मूल स्वरूप को लगभग विस्मृत कर दिया। ऐसे में जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) के तहत शिक्षा के भारतीयकरण की बात की जा रही है, तब ‘हिन्दू अध्ययन केन्द्र’ की स्थापना एक ऐतिहासिक कदम कहा जा सकता है।
🔹 हिन्दू अध्ययन केन्द्र: उद्देश्य और संरचना
इस केन्द्र की स्थापना का मूल उद्देश्य युवाओं में भारतीय ज्ञान परंपरा की गहरी समझ विकसित करना है। इसमें निम्नलिखित विषयों पर विशेष बल दिया जाएगा:
- भारतीय दर्शन एवं तत्त्व विमर्श
- रामायण, महाभारत एवं धार्मिक ग्रंथों का तुलनात्मक अध्ययन
- वेद-पुराण एवं वाद-परंपरा का अनुशीलन
- धर्म एवं कर्म विमर्श
- नेतृत्व और संगठनात्मक व्यवहार
चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम के साथ ही परास्नातक स्तर पर भी बहुविषयक अध्ययन की समुचित व्यवस्था की जाएगी।
🔹 बीएचयू के बाद दूसरा प्रमुख केन्द्र
उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने बैठक के दौरान यह स्पष्ट किया कि यह केन्द्र देश में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के बाद ऐसा दूसरा केन्द्र होगा जहां वेद, पुराण, भारतीय दर्शन एवं अध्यात्म विषयों पर विधिवत अध्ययन-संस्थान स्थापित होगा। इसका सीधा तात्पर्य यह है कि उत्तराखण्ड शिक्षा की उस परंपरा में पुनः लौट रहा है, जो नैतिकता और सांस्कृतिक चेतना पर आधारित थी।
🔹 आध्यात्मिकता, नैतिकता और सांस्कृतिक चेतना की पुनर्स्थापना
डॉ. रावत का यह कथन कि “यह केन्द्र आधुनिकता एवं परम्पराओं के बीच सेतु का कार्य करेगा”, न केवल एक शिक्षा नीति का उद्घोष है, बल्कि यह भारतीय समाज में मूल्यों की पुनर्स्थापना की आवश्यकता की ओर संकेत करता है। यहां से निकले छात्र न केवल शास्त्रों के ज्ञाता होंगे, बल्कि सांस्कृतिक दूत भी होंगे।
🔹 शोध और अनुसंधान की नई दिशा:
केन्द्र में अध्ययन मात्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें भारतीय अनुसंधान पद्धति पर भी विशेष बल दिया जायेगा। शोधार्थी भारतीय ग्रंथों की आधुनिक व्याख्या के माध्यम से वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक व प्रबंधन क्षेत्र में मार्गदर्शन प्रस्तुत करेंगे।
🔹 कार्यान्वयन की दिशा में कदम:
सचिवालय स्थित डीएमएमसी सभागार में आयोजित बैठक में डॉ. रावत ने विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल को सभी आवश्यक औपचारिकताएं शीघ्र पूर्ण करने के निर्देश दिये। इस दौरान ‘डॉ. नित्यानंद हिमालयी शोध एवं अध्ययन केन्द्र’ और ‘एमएससी अर्बन डेवलपमेंट मैनेजमेंट’ की प्रगति की भी समीक्षा की गई।
🔹 भविष्य की दिशा और चुनौतियां:
दून विश्वविद्यालय को ‘सेंटर फॉर एक्सीलेंस’ के रूप में स्थापित करने हेतु अब कई रणनीतिक प्रयास किये जाने की आवश्यकता है। हिन्दू अध्ययन केन्द्र की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उसमें शुद्ध अकादमिकता के साथ ही भारतीय अध्यात्मिकता का प्रामाणिक समावेश किया जाये।
🔹 उत्तराखण्ड की भूमिका:
हिमालय की गोद में बसा उत्तराखण्ड न केवल ऋषियों की तपोभूमि रहा है, बल्कि ज्ञान, ध्यान और दर्शन की भूमि भी है। यहां पर हिन्दू अध्ययन केन्द्र की स्थापना, राज्य की उस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक भूमिका को भी पुनर्स्थापित करने जैसा है जिसे आधुनिक काल में पीछे छोड़ दिया गया था।
🔹 निष्कर्ष:
‘हिन्दू अध्ययन केन्द्र’ का उद्घाटन केवल एक अकादमिक कदम नहीं है, यह एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण की ओर अग्रसर यात्रा है। यह पहल शिक्षा को आत्मा से जोड़ने का प्रयास है, जहां ज्ञान केवल कौशल नहीं बल्कि जीवन का दर्शन भी होगा।
