पहाड़ों की छाती छलनी: अरावली और उत्तराखंड में अनियोजित विकास का कड़वा सच
रिपोर्ट: सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’
अरावली की गोद में बसा गुलाबी शहर और हिमालय की छांव में सांस लेता उत्तराखंड—दोनों ही भारत की प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर के जीवंत प्रतीक हैं। लेकिन जब विकास के नाम पर पहाड़ों की छाती छलनी होने लगे और शहरों के माथे पर दाग उभर आएं, तो इतिहास और भूगोल दोनों कराह उठते हैं।

जयपुर: इतिहास, स्थापत्य और भू-पारिस्थितिकी
कुछ समय पूर्व विवाहोत्सव में सम्मिलित होने जयपुर जाने का अवसर मिला। चार दशक पहले छात्र जीवन में देखी गई ‘पिंक सिटी’ की स्मृतियां ताजा हो उठीं। हाल ही में प्रतिष्ठित पत्रिका ‘युगवाणी मासिक’ में प्रकाशित जगमोहन रौतेला के लेख “नष्ट होती अरावली तो—” ने मन को पहले ही विचलित कर रखा था। इसलिए इस ऐतिहासिक नगर को देखने की उत्सुकता केवल पर्यटन नहीं, बल्कि उसकी भू-पारिस्थितिकी को समझने की भी थी।

जयपुर तीन ओर से अरावली पर्वतमालाओं से घिरा है। शहर की ढलान दक्षिण और दक्षिण-पूर्व की ओर है। इसकी सबसे ऊंची पहाड़ी पर स्थित है भव्य नाहरगढ़ किला। 1727 में सवाई जयसिंह द्वितीय ने आमेर से राजधानी स्थानांतरित कर इस शहर की स्थापना की। वास्तुकार विद्याधर द्वारा नियोजित यह नगर भारतीय शहरी नियोजन का अनुपम उदाहरण है।

हवा महल, सिटी पैलेस, जल महल और जयगढ़ किला जैसे स्थापत्य चमत्कार इतिहास की भव्यता का परिचय देते हैं। किंतु जब प्रताप नगर से हल्दीघाटी मार्ग होते हुए रामगंज की ओर बढ़ा, तो अरावली की कटी-फटी पहाड़ियां देखकर मन विचलित हो उठा।

अरावली: प्राचीन पर्वतमाला पर आधुनिक प्रहार
अरावली विश्व की प्राचीनतम पर्वतमालाओं में से एक है। यह राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात तक फैली हुई है और मरुस्थल के विस्तार को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जैव विविधता, जल स्रोतों और पर्यावरण संतुलन की दृष्टि से इसका संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।

अतीत में निर्माण हेतु पहाड़ियों का सीमित और श्रम-आधारित कटान होता था। स्थानीय स्तर पर उतनी ही भू-सामग्री का उपयोग होता था जितनी आवश्यक हो। किंतु आज भारी मशीनों द्वारा अनियोजित और अंधाधुंध खनन ने पहाड़ों को नासूर बना दिया है। ये घाव वर्षों तक नहीं भरते।
हालांकि न्यायपालिका और शासन द्वारा खनन पर रोक लगाने के प्रयास हुए हैं, परंतु भू-माफिया की गतिविधियां समय-समय पर सामने आती रही हैं। यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाली पीढ़ियां इसके दुष्परिणाम भुगतेंगी।

उत्तराखंड: विकास या विनाश?
जयपुर से लौटकर जब ऋषिकेश पहुंचा और चंबा की ओर बढ़ा, तो बगड़धार में घंटों जाम में फंसा रहा। शुष्क मौसम के बावजूद ऑल वेदर रोड परियोजना के कारण पहाड़ियों से चट्टानें दरकती रहीं। सिरवा बगड़, नारायण बगड़ जैसे भूस्खलन क्षेत्रों से हमने क्या सीखा?
पर्यटन के नाम पर पहाड़ों में विशाल होटल निर्माणाधीन हैं। नरेंद्र नगर के ऊपर बहुमंजिला संरचनाएं खड़ी हो रही हैं, जबकि नीचे के गांवों—कुमारखेड़ा, डौंर, गुजराड़ा—में भू-संतुलन बिगड़ता जा रहा है। क्या यही सुनियोजित विकास है?
विकास आवश्यक है, परंतु नियोजन और पर्यावरण संतुलन के साथ। अन्यथा पहाड़ों की प्राकृतिक सुंदरता केवल स्मृति बनकर रह जाएगी।
इतिहास बनाम भूगोल: संरक्षण ही समाधान
इतिहास मानव निर्मित है, जबकि भूगोल प्रकृति प्रदत्त। इतिहास को हम पढ़ते और लिखते हैं, लेकिन भूगोल को केवल बचाया जा सकता है।
यदि शासन-प्रशासन, स्थानीय समाज और पर्यावरणविद समय रहते सचेत नहीं हुए, तो भू-माफिया और अंधाधुंध विकास की दौड़ पहाड़ों को खोखला कर देगी।
उत्तराखंड हो या राजस्थान—प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना ही सच्चा विकास है। अन्यथा पहाड़ों की छाती छलनी होती रहेगी और शहरों के माथे पर दाग बढ़ते जाएंगे।
अरावली और हिमालय केवल पत्थरों का समूह नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान, जल स्रोतों और पर्यावरणीय संतुलन की आधारशिला हैं। नियोजित विकास, सख्त पर्यावरणीय कानूनों का पालन और स्थानीय सहभागिता ही समाधान है।
यह समय की पुकार है—पहाड़ों को बचाइए, प्रकृति को बचाइए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इन पर्वतों की गोद में सुरक्षित सांस ले सकें।
