🌏 2025 का चातुर्मास यादगार बना, जब प्राकृतिक आपदाओं से कहीं अधिक मानवजनित आपदाओं ने चेतावनी दी कि यदि हमने समय रहते प्रकृति का सम्मान नहीं किया, तो भविष्य में विनाश अटल होगा।
लेखक: सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’
संपादकीय विशेष, सरहद का साक्षी
न्यूज़ और व्यूज़ का गहरा रिश्ता
समाचार जगत में न्यूज़ और व्यूज़ दोनों ही अपने-अपने महत्व रखते हैं। न्यूज़ वर्तमान का साक्षी है, जबकि व्यूज़ दूरगामी दृष्टिकोण और भविष्य के लिए मार्गदर्शन प्रस्तुत करता है। न्यूज़ तत्कालिक प्रभाव डालता है, लेकिन व्यूज़ हमें सोचने पर मजबूर करता है और समाज को दिशा प्रदान करता है।
इसी परिप्रेक्ष्य में 2025 का चातुर्मास (मानसून काल) हम सभी के लिए एक सीख लेकर आया है। यह केवल चार महीनों का मौसम नहीं था, बल्कि एक चेतावनी थी कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ हमें किस हद तक संकटों में डाल सकती है।
इस वर्ष का चातुर्मास: एक अलग अनुभव
“इस वर्ष का चातुर्मास प्रत्येक हिंदुस्तानी को याद रहेगा। कई वर्षों के बाद पूरे चार महीने मानसून का प्रभाव रहा। मानसून की शुरुआत, मध्य और लौटता हुआ प्रभाव बहुत ही विनाशकारी रहा।”
चार महीने लगातार देश भर में वर्षा, बाढ़, भूस्खलन और विनाशकारी दृश्य देखने को मिले। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय प्रदेश से लेकर गुजरात, पंजाब और मुंबई जैसे शहरी इलाकों तक—कहीं सड़कों के धँसने, कहीं मकानों के ढहने और कहीं खेतों के नष्ट होने की खबरें सुर्खियों में रहीं।
मानव की याददाश्त और आपदा का इतिहास
मनुष्य अतीत को बहुत जल्दी भूल जाता है। लेखक 65 वर्ष के अनुभव से बताते हैं कि 1979 का आंध्रप्रदेश चक्रवात, 1991 का उत्तरकाशी भूकंप, 2013 का केदारनाथ हादसा, और अनेक अन्य आपदाएं इतिहास में दर्ज हैं।
लेकिन समस्या यह है कि हमने उनसे कभी सबक नहीं लिया। हर बार आपदा आती है, और हर बार हम उसे दैवीय आपदा कहकर टाल देते हैं।
प्राकृतिक बनाम मानवजनित आपदाएं
लेख में स्पष्ट कहा गया है:
“पहाड़ हो या मैदान आपदाएं प्राकृतिक कम और मानव जनित अधिक हैं।”
- जंगलों की अंधाधुंध कटाई
- नदियों से अवैध खनन
- पहाड़ों को छलनी करती सड़कें
- शहरीकरण के नाम पर कंक्रीट के जंगल
- प्रदूषण और अपशिष्ट प्रबंधन की अनदेखी
ये सब मिलकर आपदा को और भी विकराल बना देते हैं।
सामाजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य
जब आपदा आती है तो अमीर व्यक्ति केवल आर्थिक नुकसान उठाता है, लेकिन गरीब लोगों की ज़िंदगी उजड़ जाती है। यही वजह है कि उत्तराखंड, हिमाचल और असम जैसे क्षेत्रों में हर बार आपदा का सबसे बड़ा बोझ स्थानीय ग्रामीणों को झेलना पड़ता है।
मीडिया और सिस्टम की भूमिका
आज मीडिया टीआरपी और सनसनी पर केंद्रित है। बार-बार भयावह दृश्य दिखाए जाते हैं, लेकिन आपदाओं के मूल कारण और ठोस समाधान पर बहस नहीं होती। सिस्टम और सरकार भी केवल आंशिक राहत देकर जिम्मेदारी से बच निकलते हैं।
कृषि और पर्यावरण का संतुलन
भारत कृषि प्रधान देश है। लेकिन आधुनिक मशीनों, रासायनिक खादों और कंक्रीट की अंधाधुंध बस्ती ने परंपरागत संतुलन बिगाड़ दिया है। पहले खेत, जंगल और जलस्रोत आपसी तालमेल से टिके रहते थे, लेकिन आज वे सभी विनाश की ओर बढ़ रहे हैं।
समाधान और दिशा
लेखक का स्पष्ट मत है कि यदि हम आपदाओं से बचना चाहते हैं तो—
- जल, जंगल और जमीन का संरक्षण करना होगा।
- प्राकृतिक जल स्रोतों और नदियों को बचाना होगा।
- रेत-बजरी का नियंत्रित दोहन जरूरी है।
- योजनाबद्ध और भूगोल-आधारित निर्माण होना चाहिए।
- अपशिष्ट प्रबंधन और रिसाइक्लिंग को प्राथमिकता देनी होगी।
निष्कर्ष: धरती माता का सम्मान
“यदि हमने समय रहते धरती माता के उपकारों का मान न रखा तो यह सर्वस्व विनाश का प्रतीक होगा। मानव जाति ही नहीं बल्कि प्राणी मात्र के लिए यह विनाशकारी सिद्ध होगा।”
धरती हमारी मां है। यदि हम उसका सम्मान करेंगे तो वह हमें जीवन देगी, यदि हम उसे आहत करेंगे तो वह प्रतिशोध भी ले सकती है। यही संदेश इस आलेख का सार है।
डिस्क्लेमर:
यह आलेख लेखक सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’ के निजी विचारों पर आधारित है। “सरहद का साक्षी” Digital Media का इससे पूर्णतः सहमत होना आवश्यक नहीं है। आलेख का उद्देश्य पाठकों के बीच जागरूकता और विमर्श को प्रोत्साहित करना है।
