प्रस्तुति: हर्षमणि बहुगुणा,
आज जिन अद्वितीय मनीषी व्यक्तित्व के विषयक जानकारी प्राप्त करने का प्रयास कर रहा हूं वे महाभाग किसी परिचय के मोहताज नहीं है। इस गांव की माटी में जिन-जिन महापुरुषों का आविर्भाव हुआ उनमें यह फोटो प्रात: स्मरणीय श्री नरदेव बहुगुणा जी का है। आप आदरणीय श्री मुंशी राम बहुगुणा जी की इकलौते पुत्र थे एक बड़ी बहिन भी आपकी थी। आपके पूज्य पिता श्री ज्योतिष सम्राट यदि कहा जाय तो अत्युक्ति नहीं होगी। अपने ज्ञान के कारण ही अपने यजमानों के मध्य गुरुवर नाम पाया जो आज भी उस गांव के लोगों द्वारा आपके वंशजों को चाहे वे पांच वर्ष का भी क्यों न हो (गुरु जी ही) पुकारा जाता है। ऐसे महामानव के घर पर सन् उन्नीस सौ चौंतीस में आपने जीवन पाकर इस गांव की माटी को पवित्र किया।
पैतृक व्यवसाय कर्मकाण्ड व ज्योतिष अपनाया
घर पर शिक्षा प्राप्त कर अपना पैतृक व्यवसाय कर्मकाण्ड व ज्योतिष अपनाया व मात्र पचपन साल की अल्पायु में १५ अप्रैल १९८९ को पंचभौतिक शरीर छोड़ कर अपने दोनों सुपुत्रों श्रीवासुदेव बहुगुणा व श्री इन्द्र देव बहुगुणा की गोद में अन्तिम स्वास लेकर अपनी धर्मपत्नी को पुत्र व पुत्रियों का भार सौंप कर अन्य किसी भूमि को पवित्र करने के लिए प्रयाण किया ऐसी दिवंगत विभूति को जिन्होंने अपने पिता श्री की लम्बी आयु को भी नहीं देखा, आपके पिता श्री ने इस गांव की प्रतिष्ठा को बढ़ाने के लिए सन् १८९० में शरीर धारण कर ८१ वर्ष की आयु का भोग भोग कर सन् १९७१ में महा प्रयाण किया । पं० सुरेशा नन्द बहुगुणा जी के चार सुपुत्रों में आप सबसे बड़े थे।
दिवंगत विभूतियों / आत्माओं को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए इस गांव पर कृपा दृष्टि बनाये रखने की प्रार्थना करता हूं आप पिता पुत्र पर यह छन्द अक्षरशः खरा उतरता है-
अथरं मधुरं वदनं मधुरं , नयनं मधुरं हसितं मधुरं।
हृदयं मधुरं गमनं मथुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्।।
