पुस्तक समीक्षा: गढ़वाल हिमालय की पारम्परिक चिकित्सा पद्धति।
लेखक: डॉ. पवन दास कुदवान
[su_highlight background=”#0d1fa3″ color=”#fffcfe”]सरहद का साक्षी @ कवि: सोमवारी लाल सकलानी, निशांत[/su_highlight]
कुछ वर्ष पूर्व मेरी विकासखंड जौनपुर टिहरीर गढवाल के विद्वान शिक्षक, डॉक्टर पवन दास कुदवान से भेंट हुई। प्रथम परिचय में ही उन्होंने अपना शोध ग्रंथ “गढ़वाल हिमालय की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति” मुझे भेट की। मैंने उस पुस्तक को गहनता से पढ़ा और एक समीक्षात्मक चिट्ठी भी उत्साहवर्धन के लिए डॉक्टर पवन को प्रेषित की।
विद्वान शिक्षक, डॉक्टर पवन कुदवान वर्तमान में राजकीय इंटर कॉलेज नागनी में प्रवक्ता के पद पर कार्यरत हैं वे कई विषयों में परास्नातक हैं। उनके जीवन की अनेकों विशेषताएं हैं। वह एक सच्चे इंसान हैं। अपने गुरुजन के प्रति आदर करना उनका स्वभाव है। मेरे मित्र प्रोफ़ेसर दिनेश सकलानी के अधीन उन्होंने अपना शोध कार्य कार्य पूरा किया था, इसलिए सदैव बातों ही बातों उनका जिक्र करते रहते हैं।
डॉक्टर पवन ग्राम स्यालसी, पोस्ट ऑफिस- भवान जौनपुर टिहरीगढवाल के मूल निवासी है। एक अध्यापक के साथ-साथ साहित्य प्रेमी हैं । उनके लेख मै विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ता आया हूं और काफी प्रभावित हुआ।
डॉक्टर पवन दास कुदवान, अनुसूचित जाति के व्यक्ति होने के बावजूद भी एक उदार चरित्र हैं । सरलता, सरसता और सच्चाई उनमें कूट-कूट कर भरी है। अपनी जाति विशेष के प्रति भी उनके मन में स्नेह और लगाव है और उनको उबारने में भी वह भरसक प्रयास करते हैं।
गढ़वाल की लोक संस्कृति में आवाजी (औजियों) का विशिष्ट स्थान है लेकिन उनकी गरीबी, शोषण और दीन -हीन ही दशा के प्रति , डॉक्टर साहब के मन में एक पीड़ा है, जो कि यदा-कदा बयां होती रहती है और वंचित वर्गों को ऊपर उठाने में भरसक कोशिश करते रहते हैं। डॉक्टर पवन बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं।
उनका लोक जीवन और लोक व्यवहार भी उत्कृष्ट है। मैंने उन्हें दो बार अपने पारिवारिक और साहित्यिक कार्यक्रम में सादर आमंत्रित किया। एक बार समयावभाव के कारण वह आ नहीं पाए लेकिन उनकी शुभकामनाएं यथा समय मुझे प्राप्त हो चुकी थी। दूसरे कार्यक्रम में वह अपना महत्वपूर्ण कार्य छोड़ कर के मेरी पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में शरीक हुए। उनकी विद्वत्ता की वहां पर उपस्थित विद्वत वर्ग ने बड़ी सराहना की।
डॉक्टर पवन कुमार का शोध ग्रंथ “गढ़वाल हिमालय की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति” उत्तराखंड के पारंपरिक चिकित्सकीय विधियों के ज्ञान पर आधारित है। यद्यपि पुस्तक को विस्तार देने में अनेक तथ्य भी उसमें सम्मिलित किए गए हैं लेकिन पुस्तक की आत्मा अमर है। डॉ साहब की पुस्तक पढ़ने के बाद अनेक विचार मेरे मन में आए, (क)सर्वप्रथम अपने व्यस्ततम शिक्षण कार्य के साथ-साथ उन्होंने किस प्रकार से एक कठिन कार्य को अपने शोध के द्वारा पूर्ण किया, जो कि लोकोपयोगी और जीवनोपयोगी है और प्रेरणास्पद है ।
(ख)शोध ग्रंथ की भाषा बहुत ही परिष्कृत और परिमार्जित है और कहीं न कहीं साहित्य का पुट भी शोध ग्रंथ में निहित है ।
(ग)गढ़वाल हिमालय की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति शोध ग्रंथ में अनेक ऐसे अनछुए पहलू भी हैं जिन्हें डॉक्टर साहब ने प्रकाश में लाने का भरसक प्रयास किया है और जो चिकित्सकों, विद्यार्थियों ,शोधार्थियों ,शिक्षकों और आम आदमियों के लिए भी उपयोगी है।
(घ) इस ग्रंथ में गढ़वाल के देवी देवताओं का भी, लौकिक एवं समसामयिक चिकित्सकीय तथ्यों का उल्लेख है साथ ही क्षेत्रीय वैद्यों, चिकित्सकों, शरीर रचना विशेषज्ञों तथा दैवीय शक्तियों के द्वारा रोग निदान का तथ्यात्मक विश्लेषण और उल्लेख किया गया है। कहने को तो शोध ग्रंथ 6 अंकों में विभक्त है लेकिन अनेक शीर्षक और उप शिक्षकों के द्वारा इस विषाद ग्रंथ को सरल व रोचक बनाया गया है।
भारत की परंपरागत चिकित्सा पद्धति विश्व में अपना सर्वोपरि स्थान रखती है ।आदि काल से वर्तमान तक भारतीय आयुर्वेद तंत्र मंत्र ,घरेलू नुक्से ,यहां तक कि प्राकृतिक औषधीय पौधों, जल ,मिट्टी, पत्थर ,खनिज, विष, जीव- जंतु आदि भी किसी न किसी रूप में औषधियों व चिकित्सा में प्रयुक्त होते रहे हैं।
डॉ पवन कुदवान ने आंशिक रूप से तथ्यों व प्रमाण सहित पुस्तक में उल्लेख किया है। एक ओर उन्होंने धनवंतरी ,अश्वनी कुमार, सुश्रुत जैसे आदिकालीन चिकित्सा शास्त्रविद एवं उनके कार्य को सम्मिलित किया, दूसरी ओर अपने स्थानीय वैद्य विशारद मोहनलाल उनियाल, जगदीश मैठानी लोकानंद लखेडा आदि वर्तमान विशेषज्ञों को भी स्थान दिया है ।
पारंपरिक लोक चिकित्सा पद्धति में गढ़वाल के प्रसिद्ध क्षेत्र में जाकर संपर्क करके क्षेत्रीय सर्वेक्षण के द्वारा अनेक स्थानीय व विश्व प्रसिद्ध दवा विशेषज्ञों का अध्ययन कर, उस ज्ञान को संकलित किया है ।अनेक धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया। पुस्तकालयों का सहारा लिया ।विद्वानों से संपर्क किया ।विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों से शोध ज्ञान हासिल किया और अपनी कुशाग्रता के द्वारा अपने ग्रंथ की विषय वस्तु का निर्माण किया।
शोध ग्रंथ में उल्लेखित संदर्भ ग्रंथ का उल्लेख एक नई प्रेरणा उत्पन्न करता है । उन पुस्तकों तथा मौलिक ग्रंथों को पढ़ने की जिज्ञासा बढ़ जाती है । रोग कारण एवं निदान को भी तत्कालिक मनीषियों चिकित्सकों ,तांत्रिक ,मंत्र विशेषज्ञों और चिकित्सकों के अनुभवों के द्वारा किए गए उपायों को वितरित किया है । स्थानीय देवी-देवताओं नाथ, भैरव ,जागर प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति के द्वारा किए गए सार्थक दृश्य का भी महत्व बखूबी से शोध का विषय बनाया और इस ग्रंथ की उपयोगिता घोषित की।
डा पवन तीन विषयों में परास्नातक हैं । इतिहास और विज्ञान उनके शोध ग्रंथ में झलकता है । क्षेत्र विशेष जौनपुर , जो आदिकाल से ही लोक साहित्य, संस्कृति व कला का जीवन है ,संस्कृति का प्रभाव भी सुरक्षित है। इस प्रकार देश काल और परिस्थितियों के अनुकूल ग्रंथ समाज उपयोगी है और समय की कसौटी पर खरा उतरता है।
खानपान, गंदगी, अंधविश्वास ,अज्ञानता, बीमारियों का एक कारण है – आहार – विहार । उनसे होने वाली बीमारियों का प्रभाव मानव जीवन पर पड़ा और अनेक रोगों का जन्म हुआ। समय- समय पर हमारी सुयोग्य चिकित्सा प्रणाली और अपनों वैद्यों के द्वारा जीवन बचाने का प्रयास किया तो दूसरी ओर तांत्रिकों, अदृश्य शक्तियों का सहारा लेकर समय-समय पर रोगों से लड़ने की क्षमता का विकास , मनोवैज्ञानिक ढंग से रोगों के निदान, करने का प्रयास भी किया गया है। जिसका संपूर्ण विस्तृत विवरण तथ्यपरक ढंग से इस शोध ग्रंथ में विद्यमान है ।
संपूर्ण गढ़वाल हिमालय मनीषियों ,विद्वानों तीर्थंकरों ज्योतिष्वर, आयुर्वेदाचार्य ,वीरो व बैरागियों की जन्मस्थली रहा है । वहीं दूसरी ओर यहां कबीलाई संस्कृति भी रही है। अनेक यक्ष ,गंधर्व राक्षस ,भूत प्रेत, छल -छिद्र ,देवी -देवता, प्रेत पिचास, कोल ,किरात, तंगण, आदिवासी क्षेत्र के निवासी रहे हैं।
प्रत्येक जाति व जनजातीय समूहों की अपनी संस्कृति रही है ।उनका लोकजीवन वह लोक पद्धतियों की भी भरमार रही । इसके साथ ही घालमेल की मिश्रित संस्कृति भी रही है । इसलिए जीवन पद्धतियों का अलग-अलग प्रभाव जन शिक्षा में भी पड़ा है। पुस्तक में इसका यथोचित वर्णन किया गया है ।
गढ़वाल के संस्कृति में कृषि ,पशुपालन और लघु उद्योग का महत्व है। शोध के द्वारा फसलों, पशुधन व मानव जीवन को बचाने में स्थानीय जादू टोना तंत्र मंत्र शक्ति, प्रकृति पूजन, लोक चिकित्सा आदि का उल्लेख किया है ।अनेक मंत्रोचार, पूजा पद्धतियों और भौतिक चिकित्सा का विश्लेषण है। साथ ही तत्कालीन विशेषज्ञों का नामोउल्लेख भी प्रचार-प्रसार संदर्भित है।
शोध ग्रंथ के परिशिष्ट में कुछ चर्चित आयुर्वेदाचार्य, शक्तियों से ओतप्रोत मनीषियों के चित्रों एवं स्थानीय भाषाओं में उल्लेखित पांडुलिपियों के छाया चित्रों को भी स्थान दिया गया है। डॉ. कुदवान का शोध प्रबंध एक शोध ग्रंथ के, एक वैज्ञानिक पद्धति से सजाया हुआ। क्रमबद्ध ज्ञान है। जिसमें जीवन रक्षा का कल्याणकारी उद्देश्य समाज हित मे है लेकिन लोक जीवन से जुड़ा होने के कारण किसी काव्य से भी कमतर नहीं । प्रत्येक पंक्ति सारगर्भित तथ्यात्मक और संगत है। इस ग्रंथ में साहित्य है । विशुद्ध भाषा है । लोक इतिहास है । लोक दर्शन है । लोक जीवन की हकीकत है। चिकित्सा के क्षेत्र में अपना कैरियर बनाने वाले युवाओं के लिए अत्यंत उपयोगी ग्रंथ है।
संक्षेप में गढ़वाल हिमालय की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति लोक, जीवन और इतिहास की त्रिवेणी है । मैं डा.पावन के उज्जवल भविष्य की कामना करता हूं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि डॉक्टर पवन अपने शोध कार्य को अविरल गंगा की निर्मल धारा की भांति गतिमान रखेंगे और देव भूमि की आने वाली पीढ़ी के लिए उनका शोध ग्रंथ तथा उनका जीवन सदा प्रेरणा देता रहेगा।
*सचिव: उत्तराखंड शोध संस्थान (रजिस्टर्ड) चंबा (टिहरीगढ़वाल) इकाई

