स्वतंत्रता दिवस की ७७वीं वर्ष गांठ की हार्दिक बधाई! आईए! हम सभी लें आज ये संकल्प
सरहद का साक्षी, परिवार की ओर से आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की ७७वीं वर्ष गांठ की हार्दिक बधाई एवं बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
आईए! आज के इस पावन पर्व व दिन पर हम सभी भारतीय एक संकल्प लें कि स्वयं को मजबूत बनाने के लिए शुद्ध भारतीय भोजन का सेवन कर अपनी संस्कृति को बढ़ावा दें और अपने साथ अपने देश को भी समृद्ध करें। आज शायद पांच प्रतिशत लोग ही होंगे जिन्होंने परतंत्रता को देखा व परखा होगा, हम उनकी दीर्घायु की कामना भी करते हैं।
शुद्ध आहार! ताजा भोजन, जीवन को स्वस्थ रखने का महा मंत्र, अपना कर लाभान्वित हो सकते हैं। इस बार चान्द्र श्रावण दो हैं अतः इस पवित्र मास में अपने को स्वस्थ रखने के लिए यह कर्म किया जा सकता है।
दो से तीन दिन पुराने ब्रेड पर तीन से छः महीने पुराना जैम लगाकर और दो से तीन दिन पुराना थैली वाला दूध पीकर अगर हम immunity की इच्छा रखते हैं तो सोचिए यह कैसे संभव है ? इससे तन तो जाएगा ही मन भी खराब होगा।
कई महीने पुराना केमिकल युक्त mineral water जिसमें कोई मिनरल्स नहीं हैं उसे पीकर अगर ताजगी की इच्छा रखतें हैं जिसे हम अपना बड़प्पन समझ कर उपयोग करते हैं! तो सोचिए कैसे संभव है?
पिंजरे जिनको अंग्रेजी में flat (फ्लैट) कहते हैं, जिनमें न ताज़ी हवा नसीब होती है न धूप। बिना सूरज की रोशनी में और बिना ताजी हवा के फ्लैट में रहकर अगर सोचते हैं कि बीमारी हमारा पीछा छोड़ देगी तो यह कैसे संभव है?
85% पानी मिला पैकेटबन्द फ्रूट जूस जिसमें तरह-तरह के केमिकल और प्रिजर्वेटिव मिला हुआ है अगर उसे पीकर उत्साह की इच्छा रखते हैं तो सोचिए कैसे संभव है?
ऐसी अनेक वस्तु हैं जो हमारे आस-पास हैं उनको देखिए समझिए और अपने बच्चों को समझाए कि चीज़/बटर/पीजा/ पास्ता/बेकरी/मैगी/ पैकेट में बंद नाइट्रोजन युक्त प्रिजर्वेटिव मिला पाम ऑयल/सड़े हुए कुरकुरे और कई तरह के कोड वर्ड में लिखे हुए इंग्रेडियंट जिनको बिना समझे खाकर हम स्वयं को शाकाहारी समझ कर अगर अच्छे स्वास्थ्य की इच्छा रखते हैं तो सोचिए यह कैसे संभव है?
योग और प्राणायाम तथा बिना खुली हवा के दिनभर एसी और मात्र एसी में रहनेवाले हमारे फेफड़े बड़ी बीमारी का झटका शायद ही झेल पाएं।
ज्वार, बाजरा, मूंग, चना और भी कई सारे धान्य छोड़कर मात्र गेंहू के भरोसे अगर सेहत की इच्छा रखते हैं तो सोचिए कैसे संभव है?
नन्हें-नन्हें बच्चों को दादी और नानी के नुस्खे छोड़कर डब्बा बंद प्रोटीन देकर हम सोचते हैं की ये स्ट्रॉन्ग (मजबूत) बन रहा है और स्ट्रॉन्ग (मजबूत) बनने की इच्छा रखते हैं तो सोचिए यह कैसे संभव है? नहाने से लेकर संवरने तक अपने को भी और परिवार के भी? कितने केमिकल शरीर पर लगा लेते हैं और सोचते हैं कि साढ़े तीन करोड़ रोम छिद्रों का कोई महत्व ही नहीं है, अगर उसके बाद सुंदर शरीर की इच्छा रखते हैं, तो सोचिए कैसे संभव है?
ताजा फल और उनका रस भारतीय भोजन और तुलसी, कड़ी पत्ता, ताजा नींबू और तरह-तरह के घर में बने मुरब्बे और नाश्ते की जगह पैकेट वाला नाश्ता और भोजन खाकर अगर ताकत की इच्छा रखते हैं तो सोचिए यह कैसे संभव है?
अपनों की नसीहत, को हम नहीं मानते हैं तो विचारिए हम कैसे महान बन सकते हैं? सोचिए यदि हम अपनों से ही छल कपट करते हैं, विधर्मियों र भरोसा करते हैं तो लाभ कैसे?
विचारणीय है कि यदि अपने देश में थोड़ा लाभ के लिए घर की बात विधर्मियों से बताते हैं, किसी की क्षति करवाने के लिए चुनावों में अपनी जीत पक्की करने के लिए पैसा देकर दूसरा उम्मीदवार खड़ा करते हैं तो स्वच्छ छवि की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
भारतीय संस्कृति की और लौटें। जो पेड़ अपनी जड़ से कट जातें हैं वह अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकते। अतः विशुद्ध भारतीय संस्कृति और सभ्यता के मापदण्डों की ओर लौट कर शुद्ध आहार लेकर, शुद्ध विचार अपना जीवन बचाने का प्रयास करें। अपनी संस्कृति से जुड़े रहिए, तभी शरीर के साथ मन भी स्वस्थ रहेगा।
स्वस्थ चित्त, तन-मन, स्वस्थ भारत।
* आचार्य श्री हर्षमणि बहुगुणा
