अर्चना धपवाल, ओंकारानंद सरस्वती राजकीय महाविद्यालय देवप्रयाग, टिहरी गढ़वाल, असिस्टेंट प्रोफेसर (राजनीति विज्ञान)
How safe are women in independent India?
*अर्चना धपवाल,
प्राचीन भारतीय संस्कृति में सैद्धान्तिक स्तर पर महिलाओं को देवियों के रूप में पूजा जाता था एवं स्त्रियों को समाज में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था लेकिन वैदिक युग के पश्चात धीरे-धीरे महिलाओं के आत्मसम्मान, त्याग, व बलिदान को नकारा जाने लगा। इस तरह उतर वैदिक काल में स्त्रियों की दशा सोचनीय होने लगी और वर्तमान स्थिति में तो यहाँ तक पहुँच गयी है कि उसके साथ आये दिन होने वाली अमानवीय घटनाओं के द्वारा उसकी मान मर्यादा को सरे आम नीलाम किया जा रहा है।
हाथरस की इस घटना ने एक बार फिर निर्भया घटना को पुर्नजीवित कर दिया
हाथरस की इस घटना ने एक बार फिर निर्भया घटना को पुर्नजीवित कर समाज और देश की न्याय व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। एक ओर हम महिला सशक्तिकरण की डीगें हाॅकते हैं, बेटी बचाओ अभियान चलाते हैं, दूसरी ओर एक पीड़ित बेटी को न्याय पाने के लिए इतने पापड़ बेलने पड़ रहे हैं। दूसरी ओर विभिन्न राजनीतिक पार्टियां इस घटना का राजनीतिकरण करके अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेकना चाहती हैं।
महिला समाज एवं परिवार का आधार स्तम्भ होती हैं।
महिला समाज एवं परिवार का आधार स्तम्भ होती हैं। मानव सभ्यता के विकास के प्रत्येक चरण में इनका अतुलनीय योगदान रहा है। किसी भी समाज अथवा देश का सम्पूर्ण विकास तभी संभव होगा जब उस देश की महिलायें व बेटियां सुरक्षित होंगी। उन्नाव, कठुवा, बिहार के मुज्जफरपुर के बालिका गृह में हुये अपराध हो या दिल्ली निर्भया कांड हो या हाथरस की घटना। ये सभी घटनायें समाज तथा शासन प्रणाली पर करारा तमाचा है जो आये दिन महिला सशक्तिकरण की बात तो करता है पर महिला सुरक्षा पर मौन है।
यह कैसा महिला सशक्तिकरण?
आखिर ये कौन सी महिलायें हैं जिनके सशक्तिकरण की बात की जाती रही है। क्या समाज के अन्तिम छोर पर खड़ी महिला भी सुरक्षित होगी, क्या वह भी सशक्तिकरण के दायरे में है, ये सभी घटनायें हमारे समाज और सिस्टम को आईना दिखाकर मुंह चिढ़ा रही है। क्योंकि ये घटनायें आज आम हो गई हैं। कुछ दिनों तक तो राजनीतिक पार्टियां अपने स्वार्थ सिद्धि हेतू खूब हो हल्ला करती हैं लेकिन पीड़ित परिवार की स्थिति जस की तस रहती है। जमीनी हकीकत को तोड़ा मरोड़ा जाता है।
अमानवीय कृत्य करने वालों के विरूद्ध न्यायिक प्रक्रिया भी इतनी लंबी और उबाऊ होती है कि पीड़ित न्याय की आशा ही छोड़ देता है और यदि कई वर्षों बाद न्याय मिलता भी है तो तब तक वह मानसिक रूप से इतना टूट जाता है कि उसे उबरने में वक्त लगता है। आजादी के कई वर्ष बीत जाने के बाद भी इस प्रकार की घटनायें तथा घटनाओं के सही और गलत की खींचतान से यह प्रतीत होता है देश अभी भी आजाद नहीं हुआ है।
अधूरी है यह आजादी
ब्रिटिश शासन से तो आजादी मिल गई, परन्तु यह आजादी अधूरी है, क्योंकि महिलायें आज भी अपनी अस्मिता की आजादी के लिए संघर्ष कर रही हैं। यद्यपि संविधान के अनु0 14 एवं 15, में पूर्ण समानता की बात कही गई है परन्तु अनेक संवैधानिक अधिकार होते हुये भी महिलाओं के साथ आये दिन उत्पीड़न की घटनायें बढ़ती ही जा रही हैं।
इन अपराधों के विरोध प्रर्दशन में जन समुदाय एवं मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, वरना सरकार इन घटनाओं के प्रति इतनी संवेदनशील नहीं होती। जनता और मीडिया के भय का असर हाथरस घटना पर भी दिखाई देने लगा है यदि ऐसा न होता तो पीड़ित के माता पिता की आवाज को हमेशा के लिए दबा दिया जाता और पुनः ऐसी घटना की पुनरावृति हो जाती है। इन घटनाओं की पुनरावृति के कई कारण हैं जैसे – नैतिक मूल्यों का पतन, विकृत मानसिकता, पंगु शासन व्यवस्था।
सिस्टम में भी कुछ बदलाव की आवश्यकता
ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए वैज्ञानिक सोच के साथ-साथ नैतिक मूल्यों की स्थापना तथा सिस्टम में भी कुछ बदलाव की आवश्यकता है। इसके साथ ही प्राथमिक तथा माध्यमिक स्तर पर शैक्षिक पाठयक्रम में नैतिक मूल्यों का समावेश एवं सम्बन्धित गतिविधियों को अनिवार्य रूप से लागू करने की पहल की आवश्यकता है। क्योंकि समाज में कोई अपराध होना साथ ही उसका भयावह रूप होना एक विकृत मानसिकता का संकेत है।
इस प्रकार की मानसिकता का शुद्धिकरण शिक्षा में नैतिक मूल्यों से सम्बन्धित क्रियाकलापों के द्वारा ही संभव हो सकता है। साथ ही सिस्टम में भी बदलाव लाना होगा जिससे त्वरित गति से सभी को न्याय मिल सके। दकियानुसी सोच को दरकिनार कर महिलाओं को वास्तविक धरातल पर मजबूत किया जाये तभी समाज व देश मजबूत हो पायेगा।
चिंतनीय विषय है महिला सुरक्षा
वर्तमान समय में महिला सुरक्षा एक चिंतनीय विषय है। जब तक समाज में महिलायें सुरक्षित नहीं होंगी तब तक महिला सशक्तिकरण की बात करना बेइमानी होगा। ऐसे अपराधों को रोकने के लिए वैज्ञानिक सोच के साथ -साथ उचित शिक्षा व्यवस्था जिसमें नैतिक मूल्यों और क्रियाकलापों की प्राथमिकता हो तथा सामाजिक जागरूकता का होना अनिवार्य है।
- लेखिका: ओंकारानंद सरस्वती राजकीय महाविद्यालय देवप्रयाग, टिहरी गढ़वाल में असिस्टेंट प्रोफेसर (राजनीति विज्ञान) के पद पर कार्यरत हैं।
