मां तेरा चरणामृत पी कर,
मै धन्य कृतार्थ हुआ।
कैल केदारपत्तियों का रस,
मै अमृत पान किया।
तेरे चरणों से निसृत जल-
पी कर अमृत्व मिला।
निर्मल शीतल रस से,
तन-मन निर्मल शुद्ध हुआ।
जल स्त्रोतों के निसृत जल से,
गाड- गधेरे नदी बनीं।
हिमनद गंगा जल समान ही,
तेरे चरणों की धार बही।
मेरा नित पावन परम तीर्थ मां,
तेरा शुचि आंचल है।
धर्म कर्म की पावन भूमि यह,
तेरा सुरकुट मंदिर है।
तेरे चतुष्पदों से पावन सुरकुट,
जलस्रोत निसृत असंख्य हुये।
हेंवल सौंग अगलाड व स्यासू,
पावन सरिता गाड कहें।
[su_highlight background=”#091688″ color=”#ffffff”]सरहद का साक्षी @कवि: सोमवारी लाल सकलानी, निशांत[/su_highlight]
*कवि कुटीर, सुमन कालोनी चंबा, टिहरी गढ़वाल।
