[su_highlight background=”#880930″ color=”#ffffff”]सरहद का साक्षी @कवि:सोमवारी लाल सकलानी, निशांत[/su_highlight]
लौट कर आ गया,
तेरे आंचल की छांव पा गया।
नये जीवन की शुरुआत,
जिन्दगी नई भा गया !
चला गया था !
तूने जाने ना दिया।
वज्र के प्रहार से-
पहाड़ टूटने ना दिया।
यह कैसे हो सकता था !
बिना तेरे आदेश के,चला जाता।
आत्मा का भटकाव-
कभी स्थिर न हो पाता।
अधूरे दायित्व !
धिक्कारते रहते सदा।
स्वर्ग की निर्रथक चाह मे,
केवल नरक ही नरक मिलता।
ऐ मां, ऐ वतन !
तेरा ममत्व कितना महान है !
बिमुख होने देती नहीं,
अपनी ममता की छांव से।
लौट कर आ गया हूं !
तूने जाने नहीं दिया।
मौत के मुख से एक बार,
फिर बाहर सुरक्षित ला दिया !
*कवि कुटीर, सुमन कालोनी चंबा, टि.ग.
