भ्रांति फैलाने वाले लेखों से रहें सावधान, धर्मशास्त्र और गणितीय प्रमाणों के अनुसार 21 अक्टूबर 2025 को ही है प्रदोषव्यापिनी अमावस्या — विनोद बिजल्वाण
ऋषिकेश, 17 अक्टूबर 2025।
दीपावली पर्व के अवसर पर श्री महालक्ष्मी पूजन की तिथि को लेकर कुछ लेखों में असमंजस की स्थिति उत्पन्न की गई है, जिसमें यह कहा गया है कि पूजन 20 अक्टूबर को होना चाहिए।
परंतु, शास्त्रीय और गणितीय प्रमाणों पर आधारित सम्यक विचार के अनुसार, श्री महालक्ष्मी पूजन 21 अक्टूबर 2025 (मंगलवार) को ही शास्त्रसम्मत एवं प्रदोषव्यापिनी अमावस्या के अनुरूप है।
यह स्पष्ट मत विनोद बिजल्वाण, श्री सिद्धिदात्री पंचांग कार्यालय, त्रिवेणीघाट ऋषिकेश के द्वारा प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने कहा कि –
“सभी प्रतिष्ठित पंचांगों ने धर्मशास्त्र के सूक्ष्म अवलोकन और गणितीय प्रक्रिया के आधार पर 21 अक्टूबर को ही श्री महालक्ष्मी पूजन की तिथि निर्धारित की है। 20 अक्टूबर को पूजन की बात करने वाले लेख धर्मशास्त्र की दृष्टि से भ्रांतिपूर्ण हैं।”
शास्त्रीय प्रमाणों से स्पष्ट: 21 अक्टूबर को प्रदोषकाल में अमावस्या
गणितीय दृष्टि से 21 अक्टूबर 2025 को अमावस्या का समाप्ति काल भारतीय मानक समयानुसार सायं 5 बजकर 55 मिनट तक है, जबकि सूर्यास्त का समय 5:35 बजे है।
अर्थात प्रदोषकाल में अमावस्या विद्यमान है, जिससे यह तिथि श्री महालक्ष्मी पूजन के लिए पूर्णतः उपयुक्त है।
श्री बिजल्वाण ने स्पष्ट किया कि कुछ लेखों में यह भ्रम फैलाया गया कि प्रदोषकाल में कम से कम एक घटी (लगभग 24 मिनट) अमावस्या की व्याप्ति होनी चाहिए, परंतु शास्त्रों में यह भी उल्लेखित है कि अमावस्या वृद्धि गामिनी होनी चाहिए, अर्थात उसकी व्याप्ति बढ़ती हुई होनी चाहिए।
इस आधार पर अमावस्या का संधिकाल 2/30 से 3 घटी तक माना गया है, जो गणितीय रूप से 21 अक्टूबर की तिथि में सिद्ध होता है।
शास्त्रीय आधार: सिद्धांत शिरोमणि और गोरक्ष पद्धति के संदर्भ
विनोद बिजल्वाण ने अपने लेख में भास्कराचार्य कृत ‘सिद्धांत शिरोमणि’ के गोल अध्याय का उल्लेख करते हुए कहा कि —
“धर्मशास्त्र में व्रत और पर्वों का निर्धारण गणितीय प्रमाणों से ही होता है। गणित की शुद्धता और धर्मशास्त्र की गहराई एक-दूसरे के पूरक हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि अमावस्या के समाप्ति काल में ही सूर्य (आत्मा) और चंद्रमा (मन) का पूर्ण मिलन होता है, जिसे योग की स्थिति कहा गया है। यही कारण है कि अमावस्या का समाप्ति काल ही मुख्य काल माना जाता है।
स्कंद पुराण के प्रभास खंड में उल्लेखित है:
“अमाषोडशभागेन देवी प्रोक्ता महाकला। संस्थिता परमा माया देहिनां देहधारिणी।।“
अर्थात — अमावस्या की 16वीं कला ही परमा माया है, जो जीवों के शरीर का पोषण करती है। यही कला अमावस्या के अंत में प्राप्त होती है, जब चंद्रमा पूर्ण रूप से सूर्य में विलीन हो जाता है।
धर्मशास्त्रीय निर्णय और गणितीय तर्क का समन्वय
धर्मशास्त्रकारों ने स्पष्ट किया है कि यदि दो दिनों में अमावस्या प्रदोषकाल व्यापिनी हो, तो दूसरे दिन ही श्री महालक्ष्मी पूजन करना शास्त्रसम्मत होता है।
भास्कराचार्य के संधिकाल निर्णय सूत्र के अनुसार, इस स्थिति में अमावस्या की वास्तविक योग स्थिति समाप्ति काल में होती है।
श्लोकानुसार—
“शशितनु विकलाभ्यश्चन्द्र भुक्त्येन्दु भान्वौ र्गतिविवरकला भिर्भूय एताभिरेव।
पृथगथ गति युत्या नाडिकाः संधिराप्ता भतिथिकरण योगानां फलं तत्र मिश्रम्।।“
इस गणितीय आधार से यह सिद्ध होता है कि अमावस्या के योगफल की गणना 5 से 6 घटी तक विस्तृत होती है, जो धर्मशास्त्र के अनुरूप है।
पंचांगकारों की जिम्मेदारी और जनजागरूकता का संदेश
श्री बिजल्वाण ने कहा कि —
“पंचांग निर्माता बिना गहन गणना और धर्मशास्त्र अवलोकन के कोई तिथि निर्धारित नहीं करते। अतः जनमानस को भ्रांतिपूर्ण लेखों से बचना चाहिए, क्योंकि इससे धर्म की हानि होती है।”
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आधुनिक तकनीक से चाहे लाखों वर्षों का पंचांग तैयार कर लिया जाए, परंतु धर्मशास्त्रीय दृष्टि से तिथि का निर्णय केवल गणितीय और आध्यात्मिक समन्वय से ही किया जा सकता है।
निष्कर्ष:
सभी प्रमाणों — भास्कराचार्य के सिद्धांत शिरोमणि, स्कंद पुराण, और प्रदोषकाल गणना — के आधार पर यह स्पष्ट सिद्ध होता है कि श्री महालक्ष्मी पूजन 21 अक्टूबर 2025 (मंगलवार) को ही शास्त्रसम्मत है।
अतः सभी श्रद्धालुओं से आग्रह है कि वे भ्रमित न हों और धर्मशास्त्रसम्मत तिथि का ही अनुसरण करें।
*विनोद बिजल्वाण
श्री सिद्धिदात्री पंचांग कार्यालय, त्रिवेणीघाट, ऋषिकेश
