आज का ज्वलन्त प्रश्न और समस्या के समाधान का विचार
“एक समय बहुत भारी वर्षा हुई। नदियों में भारी बाढ़ आई। अति भारी बारिश से नदियों किनारे बसे गांवों पर जोखिम देख व्यवस्था तंत्र द्वारा गांवों को खाली कराया जा रहा था। प्रजाजनों को सलामत अन्य जगह स्थानान्तरित कर दूसरी जगह ले जाने के लिए अनेक बड़े वाहनों की व्यवस्था की गई थी और लोगों को ले जाया जा रहा था।
[su_highlight background=”#880e09″ color=”#ffffff”]सरहद का साक्षी, आचार्य हर्षमणि बहुगुणा [/su_highlight]
गांव में एक भव्य शिवमंदिर था। मंदिर का पुजारी जो शिवजी का अनन्य भक्त था। जब सरकारी अधिकारी उन्हें लेने आये तो उन्होंने आने से मना कर दिया। पुजारी बोला :- मैं महादेव का भक्त हूँ , मेरी रक्षा महादेव करेंगे यह मेरा विश्वास है। आप सब जाइये , मैं यहां मंदिर में ही रहूंगा।
धीरे धीरे पानी बढ़ने लगा और गांव डूबने लगा। जब मंदिर की पहली मंजिल पानी में डूब गई तो पुजारी दूसरी मंज़िल पर चले गए। सरकारी तंत्र की रेस्क्यू टीम बोट लेकर फंसे लोगों को बचाने आ गई। मंदिर पहुंचकर पुजारी जी को बोट में बैठ जाने को कहा।
फिरसे पुजारी का जवाब :- मैं शिवजी का उपासक हूँ। इस कुदरती आफत से मुझे डरने की जरूरत नहीं। आप जाइये। रेस्क्यू टीम चली गई और थोड़े समय के बाद पानी बहुत बढ़ गया। मंदिर और मकान की दूसरी मंजिल भी डूब गई। टेरिस पर खड़े पुजारी को लेने रेस्क्यू टीम का हेलीकॉप्टर आया पर मंत्रजाप में मशगूल पुजारी नहीं गए और पानी बढ़ते ही डूब गए।
मृतक पुजारी का जीव कैलास पहुंच गया और देवाधिदेव महादेव से फरियाद करने लगा।
महादेव ने कहा :- तुम्हारी भक्ति के अधीन मैं तुम्हें बचाने तीन बार आया। रेस्क्यू टीम में भी मैं था , बोट नाव स्वरूप में भी मैं था , हेलीकॉप्टर में भी मैं था चं। तुम नहीं आए ! क्या मैं अपने नंदी पर बैठकर डाक डमरू लेकर ही तुम्हें लेने आऊं ?
ऐसी कल्पना ही क्यों करनी है? समस्त जगत के हर जीव मेरा ही स्वरूप हैं। मैं किसी भी रूप में आ सकता हूं।
“ये दृष्टांत समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि ज्यादातर लोग अपने इष्ट को एक निश्चित स्वरूप में ही देखना चाहते हैं। सगुण साकार होते हुए भी वो कार्य और समय अनुसार उनका प्राकाट्य हमारे देहकी ऊर्जा शक्ति से ही होता है। एक जीव की विनती सुनकर चौदह ब्रह्मांड की एक पृथ्वी, उनका एक गांव, उनमें एक जीव के लिए सब छोड़-छाड़ यहाँ आना पड़े तो उन्हें विराट शक्ति कैसे नहीं कह सकते हैं ? एक ही समय ब्रह्मांड के करोड़ों जीव उन्हें पुकारें और उन करोड़ों जीवों के पास एक ही समय वह प्रकट हो जाते हैं। क्योंकि हमारी देह में ही वो ऊर्जा शक्ति स्वरूप बिराजमान होते हैं।
वेद में कहा है- वेद उवाच ” यथा पिंडे तथा ब्रह्माण्डे “जो ब्रह्मांड में है वो सब कुछ हमारे अंदर भी है। जिन जिन देवी देवताओं की हम मंत्र, पूजा, अनुष्ठान करते हैं वो हमारे अंदर ही जागृत होने लगते हैं।
कई बार लोग कहते हैं कि जब हम जप कर रहे होते हैं तब उस पर कोई अनुभूति नहीं हो रही होती है या जप में ध्यान नहीं लगता। इसका मतलब है कि हमको अपने आप पर ही भरोसा नहीं है। पहले तो खुद पर ये भरोसा होना चाहिए कि मेरे इष्ट मेरे अंदर उपस्थित है। अपने मार्गदर्शक गुरु पर/ईश पर विश्वास होना चाहिए कि उन्होंने जो कहा वही ब्रह्म सत्य है। अगर मन में विश्वास और श्रद्धा नहीं तो कोई फल नहीं ये सनातन सत्य है।
सबसे पहले तो खुद की मान्यताओं को छोड़ो। जरूरी नहीं कि आज की मान्यताओं या हमनें जो सुना, देखा वह ही ४ सही हो। मैं बहुत ज्ञानी हूँ, सब तत्वों का जानकार हूँ यह अहम् जब तक है तब तक गुरुकृपा / ईशकृपा सम्भव नहीं। इसलिए यह कई बार कहा जाता है कि विनम्रता के साथ सम्पूर्ण समर्पित भाव से जब गुरु के पास जाएंगे तब ही उनकी कृपा सम्भव है । सफलता सिर्फ हमारे जप, तप, पूजा से नहीं गुरुकृपा और सत्कर्मो से मिलती है।
देवी देवता कोई मनुष्य जैसे देह नहीं वह तो ऊर्जा स्वरूप हैं, कभी कभी हमारे मन में जो चित्र होता है ऐसा ही रूप लेकर वो हमारे अंदर से ही प्रगट होकर हमें दर्शन देते हैं और हमारा कार्य करते हैं। जब हम गणपति जी या अन्य किसी भी देवी-देवता की उपासना कर रहे होते हैं तब उनकी प्रसन्नता से ही हमारे आसपास ऐसी परिस्थिति का निर्माण होने लगता है। किसी महापुरुष से मुलाकात होती है, नया काम मिल जाता है, व्यापार में वृद्धि होने लगती है, अच्छी कन्या मिल जाती है, पुत्र प्राप्ति होती है, रोग और दारिद्र्य का नाश होकर सब अच्छा होने लगता है , कुटुम्ब और समाज में मान-सम्मान और प्रतिष्ठा होती है ये सब करने के लिए वो खुद नाव पर बैठकर नहीं आते- कि चल भाई मैं तेरा काम करने आया हूँ।
हमारा मतलब है जब स्वयं पर विश्वास होने लगे कि मेरे अंदर कोई शक्ति जागृत हो रही है। ऐसा भाव को कहते है श्रद्धा और विश्वास। ब्रह्म का स्वरूप है — जैसे हम, हमारे मन में जो चित्र बनें हैं उनके प्रति समर्पण और उनका निवास स्थान है हमारा हृदय।
परम कृपालु परमात्मा सदाशिव हम सब पर सदैव कृपा दृष्टि बनाएं रखें। “इस विचार / कथन का अभिप्राय है कि आज हम अपने शाश्वत सत्य को भुला रहे हैं और अपने पर्व व त्यौहारों पर अभक्ष्य का भक्षण कर, अनीति का वरण कर पर्व व धर्म की परम्पराओं की अनदेखी कर रहे हैं।
सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बना हुआ है कि होली के रुझान आने लग गए है। इस विषय पर खुद हमें ही चिन्तन करना है, समझना है। मर्यादा का पालन करना आवश्यक है और जब मर्यादा का उलंघन होता है तो उसकी सजा समाज को भुगतनी पड़ती है। अतः इन पर्वों को हिन्दू परम्पराओं के अनुसार देखने व समझने की आवश्यकता है तभी हमारा धर्म सुरक्षित रहेगा। कुछेक धर्म द्रोहियों द्वारा इस धर्म को नष्ट करने का कुचक्र/षड़यंत्र चलाया जा रहा है जिसे हम न समझने की भूल कर रहे हैं। इस दृष्टांत से समझने का प्रयास करते हैं कि ‘जब किसी व्यक्ति या परिवार को बर्वाद करने का षड़यंत्र चलाया जाता है तो उसके नौनिहालों को व्यसन की राह पर लगाया जाता है’, इस तरह का समाज आज खुले आम यह सब कुछ कर रहा है। अतः अभी समय है अपने आप को संभालने का, बचाने का! तो आइए इस पर मनन करते हुए अपने धर्म को सुरक्षित रखने का फैसला किया जाय, करना चाहिए। विषय गम्भीर है चिन्तन आवश्यक है।
