यह कैसा रोना है भाई !
कोरोना के डर के कारण, कांप उठा धरती- आकाश।
यूरोप एशिया और अमरीका, थर- थर कांपा संसार।
अर्थ व्यवस्था जमींदोज हो गई, सिमट रहा है बाज़ार।
काम काज ठप्प हो गया, शिक्षक बच्चों का अवकाश।
खांस रहा नहीं बूढ़ा बच्चा , पकड़ न ले यह को रोना।
लगे नमस्ते करने कामरेड,बाय बाय,टा टा,क्या होना।
पंडित जी जजमानी छोड़ी, बाबू ने दफ्तर कार्यालय।
कमलनाथ जी फ्लोर टेस्ट अरु गुरु जी ने विद्यालय।
महामारी का नाम सुना जब, बूढ़ी दादी भी कांप उठी।
हैजा, चेचक, प्लेग ,यक्ष्मा, स्मरण कर वह हांप रही।
यह कैसा रोना है भाई, क्यों बोल रहे हैं सब कोरोना।
बच्चे पागल कैद घरों में, कहें हाथ सभी को है धोना।।
😀 @कवि : सोमवारी लाल सकलानी, निशांत ।

