“आज पितृ विसर्जन अमावस्या है, जो बहुत पुण्यदायक है, सर्व पितृ विसर्जन, आज उन लोगों को याद करने का दिन है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, समाज में कभी कभी कुछ भ्रान्तियां फैल जाती हैं कि आज के दिन केवल उन्हें याद किया जाता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात न हो? परन्तु जिसकी जो मृत्यु तिथि होती है उन्हें उस दिन अवश्य आमंत्रण देना चाहिए। मृत्यु अटल है और जिस दिन स्वास पूरी उस दिन जाना तय। इसलिए मृत्यु तिथि पर श्राद्धकर्म आवश्यक। अतः आज के पितृ तर्पण का विशेष महत्व है। यह उनके लिए महत्वपूर्ण है जो अपने धर्म के प्रति आस्थावान हैं और धर्म को सर्वोपरि मानते हैं । धर्म लोक दिखावा भी नहीं है। तभी तो भगवान श्री कृष्ण ने कहा था कि ‘ स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह: ‘।
अपने देश व अपने धर्म के प्रति जागरूक रहने की आवश्यकता है, लोक दिखावा नहीं? अपने धर्म की मजाक भी नहीं करनी चाहिए, आगे के इस सन्देश से बहुत कुछ सीखा जा सकता है।
“एक अमेरिकी व्यक्ति हिंदुस्तान में घूमकर, जब वापस अमेरिका पहुचता है तो उसका एक हिंदुस्तानी मित्र उससे पूछता है:-
“कैसा रहा हिंदुस्तान का भ्रमण?”
वह बोलता है:-
“वास्तव में हिंदुस्तान एक अद्वितीय जगह है।”
मैंने वाराणसी के घाट देखें, अक्षरधाम मंदिर देखा, इंडिया गेट, लाल किला, गेटवे ऑफ इंडिया, अजंता – एलोरा की गुफाएं, पुरी का मंदिर, मथुरा जी, दिल्ली-मुंबई से लेकर भारत की हर वह छोटी बड़ी जगह देखी जो प्रसिद्ध हैं।”
हिंदुस्तानी अपने देश की तारीफ सुनकर बहुत खुश हुआ। और पूछा:-
“हमारे हिंदुस्तानी भाई कैसे लगे?”
अमेरिकी बोला:-
“वहां तो मैंने कोई हिंदुस्तानी देखा ही नहीं।”
हिंदुस्तानी उसका मुंह देखने लगा !! बहुत बड़ा आश्चर्य?
अमेरिकी बोलता रहा-
“मैं एअरपोर्ट पर उतरा तो सबसे पहले मेरी भेंट मराठियों से हुई, आगे बढा तो पंजाबी, हरियाणवी, गुजराती, राजस्थानी , बिहारी, तमिल और आसामी जैसे बहुत से लोग मिले।
छोटी जगहों पर गया तो बनारसी, जौनपुरी, सुल्तानपुरी, बरेलवी आदि मिले।
नेताओं से मिला तो कांग्रेसी, भाजपाई, बसपाई, आप वाले।
गाँव में गया तो ब्राह्मण, जाट, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र मिले। परन्तु हिंदुस्तानी तो कहीं मिले ही नहीं?
इस सच्चाई को आज के पितृ विसर्जन अमावस्या के साथ भी जोड़ा जा सकता है। यह पितृपक्ष आज समाप्त हो रहा है, अर्थात् श्राद्ध आज समाप्त हो जाएंगे, पर ध्यान यह रखना होगा कि श्रद्धा कभी भी समाप्त न हो?
हमारे देश में दिवंगत आत्माओं के लिए श्राद्ध जैसी अनूठी परम्परा है, जो श्रद्धा से उत्पन्न होती है। तो फिर जीवित बुजुर्गों के लिए वृद्धाश्रम की कल्पना क्या हास्यास्पद व लज्जाजनक नहीं है। कौन भेजते हैं अपने बुजुर्गो को वृद्धाश्रम जो बाहर के लोगों से अपने माता-पिता के लिए तथा कथित छल का नाटक करते हैं, मैं अपने बुजुर्गो को बहुत प्यार से रखता हूं आदि आदि। अतः प्रयास यह किया जाय कि वर्ष के शेष दिनों अपने जीवित बुजुर्गों की सेवा की जाय। अन्यथा इन सोलह दिनों जो भी पुण्य किया व्यर्थ चला जायेगा, और यहां से अमेरीका जाकर यही कहेंगे कि भारत में कोई भारतीय नहीं मिला। अपनी संस्कृति को बचाते हुए आचरण में भी उतारने का यत्न करेंगे।
“सार सार को गही रहे थोथा देय उड़ाय”
“बहुत कड़वा हैं किन्तु सत्य है।
*आचार्य हर्षमणि बहुगुणा
