मानव जीवन का आदर्श है चरित्र, व्यक्ति के कृत्यों का पता उसके चरित्र से हो जाता है ज्ञात
मानव जीवन का आदर्श है चरित्र। व्यक्ति के कृत्यों का पता उसके चरित्र से ज्ञात हो जाता है। अपने चरित्र को उज्ज्वल बनाने के लिए व्यक्ति के अन्दर अस्तेय (किसी की वस्तु को बिना पूछे न लेना) सत्य का पालन करना, सहिष्णु रहना, शिष्टाचार का पालन करना, कृतज्ञ रहना, परोपकार की भावना को दृष्टिगत रखते हुए दूसरों के प्रति समर्पण, जो बोलें उसका पालन करना, (यथा सम्भव शत प्रतिशत) इन सब बातों से हमारे संस्कारों का पता चलता है।
अपने धर्म का पालन करना तो हमारा कर्तव्य है परन्तु दूसरों के धर्म पर कोई आघात न करें! परन्तु यदि कोई हमारी आस्था या धर्म पर प्रहार करता है तो उसे समझाना/ चेताना आवश्यक है। ‘पर धर्मो भयावह ‘ समझने वाली बात है कि परिवार में यदि एक दूसरे के प्रति असत्य भाषण करेंगे? तो परिवार की स्थिति भयावह हो जाएगी।
यदि पुत्र पिता से असत्य कह कर कहीं जाता है, पुत्र वधू कहीं जाती है, अन्य बच्चे इसी तरह झूठ बोल कर कुछ अप्रिय करते हैं तो विचारिए उस परिवार की क्या दशा होगी। प्यार प्रीति से घर परिवार महकता है, आनन्द की अनुभूति होती है, जबकि अहंकार से सब नष्ट हो जाता है, अहंकार का त्याग किए जाने से अपने को उन्नति के पथ पर अग्रसर किया जा सकता है।
इस संसार में क्या रखा है सब नंगे आए और नंगें ही जाएंगे। यहां मेरा क्या है जो साथ जाएगा? शिष्टाचार पूर्ण व्यवहार, छल कपट रहित जीवन, सच का पालन, मन मुख एक समान। ‘सत्य मेव जयते’। आशा है इन बातों का पालन करते हुए अपने से बड़ों का सम्मान करना सीखेंगे।
बातें कम, काम ज्यादा’, इस मंत्र को अपने जीवन में उतारना अपेक्षित
‘बातें कम, काम ज्यादा’, इस मंत्र को अपने जीवन में उतारना अपेक्षित है। झूठी शान दिखाने की आवश्यकता नहीं है। धन अधिक होना अच्छे चरित्र की निशानी नहीं है। असत्य बोलने से ही व्यक्ति के डी एन ए का पता चल जाता है। आदमी अछूत कब होता है जब वह व्यवहार में स्वच्छ साफ छवि नहीं रखता है।
गरीब सब हैं, जो काम के बदले दाम लेता है वह गरीब है। लोभ लालच किसे नहीं हैं, इसी कारण तो आदमी धन कमाने हेतु यत्र तत्र भागता है, विदेश दौड़ रहा है। कभी सोचा है कि जो टिप्पणी हम दूसरों पर करते हैं वह हम पर कितनी खरी उतरती है, अतः अपना चस्मा साफ होना आवश्यक है। समझने के लिए पर्याप्त होना चाहिए।
बहुत बड़ी दौलत के मालिक होने के बावजूद भी यदि मन में कुछ पाने की चाह बाकी है तो समझ लेना वो अभी दरिद्र ही है और कुछ पास में नहीं फिर भी जो अपनी मस्ती में झूम रहा है उससे बढ़कर भी कोई दूसरा करोड़ पति नहीं हो सकता है।
जो कुछ नहीं मांगता उसको भगवान स्वयं को दे देते हैं
सुदामा को गले लगाने के लिए आतुर द्वारिका धीश इसलिए भागकर नहीं गए कि सुदामा के पास कुछ नहीं है अपितु इसलिए गए कि सुदामा के मन में कुछ भी पाने की इच्छा अब शेष नहीं रह गयी थी। इसलिए ही संतों ने कहा है कि जो कुछ नहीं मांगता उसको भगवान स्वयं को दे देते हैं। द्वारिकापुरी में आज सुदामा राजसिंहासन पर विराजमान हैं और कृष्ण समेत समस्त पटरानियाँ चरणों में बैठकर उनकी चरण सेवा कर रही हैं।
सुदामा अपने प्रभाव के कारण नहीं पूजे जा रहे हैं अपितु अपने स्वभाव और कुछ भी न चाहने के भाव के कारण पूजे जा रहे हैं।
सुदामा की कुछ भी न पाने की इच्छा ने उन्हें द्वारिकापुरी का राजसिंहासन प्रदान कर दिया मानो कि भगवान ये कहना चाह रहे हों कि जिसकी अब और कोई इच्छा बाकी नहीं रही वो मेरे ही समान मेरे बराबर में बैठने का अधिकारी बन जाता है। मनुष्य की कामना शून्यता ही उसे सबसे अधिक मूल्यवान, अनमोल और उस प्रभु का प्रिय बना देती है। जिसमें डिमांड नहीं होती वह ही डायमंड होता है।
*प्रस्तुति: आचार्य श्री हर्षमणि बहुगुणा
