टिहरी मेडिकल कॉलेज या राजनीतिक अखाड़ा? विकास की दिशा तय करेगा संवाद या टकराव : विशेष सम्पादकीय
टिहरी के भविष्य पर निर्णय, राजनीति के वर्तमान की परीक्षा
✍️ केदार सिंह चौहान ‘प्रवर’
सम्पादक, सरहद का साक्षी, डिजिटल मीडिया
टिहरी जनपद में प्रस्तावित राजकीय मेडिकल कॉलेज का विषय अब केवल एक शैक्षणिक या स्वास्थ्य परियोजना नहीं रह गया है। यह धीरे-धीरे जनभावनाओं, क्षेत्रीय अस्मिता, राजनीतिक प्रतिष्ठा और आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीतियों का केंद्र बिंदु बनता दिखाई दे रहा है। एक ओर नई टिहरी और भागीरथीपुरम (इडियान) क्षेत्र के लोग मेडिकल कॉलेज को जिला मुख्यालय के निकट स्थापित करने की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी ओर गजा-नकोट-मखलोगी-धारअकरिया क्षेत्र के जनप्रतिनिधि एवं ग्रामीण कोटेश्वर बांध के समीप फिपल्टी क्षेत्र में मेडिकल कॉलेज की स्थापना को न्यायसंगत ठहरा रहे हैं।
यह स्थिति केवल दो स्थानों के बीच चयन का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह इस बात की भी परीक्षा है कि विकास के बड़े निर्णय किस प्रकार लिए जाएं—संवाद से या राजनीतिक टकराव से।
घोषणाओं का लंबा इतिहास, धरातल पर इंतजार
टिहरी मेडिकल कॉलेज की कहानी कोई नई नहीं है। वर्ष 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने नई टिहरी में मेडिकल कॉलेज स्थापित करने की घोषणा की थी। समय बीता, सरकारें बदलीं, लेकिन परियोजना कागजों से आगे नहीं बढ़ सकी।
इसके बाद 2023 में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी मेडिकल कॉलेज की घोषणा की। प्रशासनिक स्तर पर विभिन्न स्थानों का सर्वे हुआ। ड्रोन सर्वेक्षण हुए। भटकोटी-पाटा क्षेत्र के ग्रामीणों ने लगभग 400 नाली भूमि दान करने की इच्छा जताई। टीएचडीसी की ओर से भागीरथीपुरम (इडियान) क्षेत्र में पूर्व अधिग्रहित भूमि उपलब्ध कराने और निर्माण में सहयोग की चर्चाएं भी सामने आईं। नागरिक संगठनों ने जिला मुख्यालय के आसपास उपलब्ध भूमि के प्रस्ताव भी दिए। इन घटनाओं ने जनता में यह विश्वास जगाया कि अब परियोजना जल्द धरातल पर उतर जाएगी।
लेकिन वर्षों बाद भी यदि मेडिकल कॉलेज की अंतिम स्वीकृति, भूमि चयन और निर्माण प्रक्रिया स्पष्ट नहीं हो पाती, तो स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में प्रश्न उठते हैं।
फिर आया नया मोड़
हाल ही में स्वास्थ्य विभाग का दायित्व संभालने के बाद कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल द्वारा जिला प्रशासन से फिपल्टी (कोटेश्वर बांध के निकट) क्षेत्र के संबंध में प्रस्ताव मांगे जाने की सूचना सार्वजनिक हुई। यहीं से पूरा विवाद एक नए चरण में प्रवेश कर गया। नई टिहरी क्षेत्र के नागरिकों का एक वर्ग इसे पूर्व की घोषणाओं से विचलन मान रहा है।
वहीं दूसरी ओर गजा, नकोट, मखलोगी, धारअकरिया और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में इसे वर्षों से उपेक्षित क्षेत्र को मिलने वाला विकास अवसर बताया जा रहा है।
दो पक्ष… दोनों के अपने तर्क
नई टिहरी के नागरिकों की दलील है कि—
- जिला अस्पताल पहले से उपलब्ध है।
- चिकित्सा शिक्षा के लिए आवश्यक आधारभूत ढांचा विकसित किया जा सकता है।
- सड़क, आवास, बिजली, प्रशासनिक सुविधाएं पहले से मौजूद हैं।
- मेडिकल कॉलेज जिला मुख्यालय की पहचान को मजबूत करेगा।
वहीं ग्रामीण क्षेत्र के प्रतिनिधियों का कहना है—
- विकास केवल शहर तक सीमित क्यों रहे?
- दशकों से ग्रामीण क्षेत्र स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित रहे हैं।
- मेडिकल कॉलेज यदि ग्रामीण क्षेत्र में बनेगा तो पूरे क्षेत्र का आर्थिक एवं सामाजिक विकास होगा।
- फिपल्टी क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से कई पट्टियों के लिए केंद्रीय स्थान बन सकता है।
दोनों पक्ष अपने-अपने दृष्टिकोण से उचित तर्क रखते हैं।
राजनीति बनाम जनहित
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पक्ष यह है कि विकास का विषय अब राजनीतिक प्रतिष्ठा से जुड़ता जा रहा है।
एक ओर विधायक किशोर उपाध्याय के समर्थक अपने प्रयासों का उल्लेख कर रहे हैं।
दूसरी ओर कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल के समर्थक ग्रामीण क्षेत्र के पक्ष में खुलकर सामने आ रहे हैं।
सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी तेज हो चुका है।
दुर्भाग्य तब होता है जब परियोजना से अधिक चर्चा नेताओं की जीत-हार की होने लगती है।
जनता को चाहिए स्पष्टता
आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि मेडिकल कॉलेज कहाँ बनेगा।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि—
- क्या परियोजना को औपचारिक प्रशासनिक स्वीकृति मिल चुकी है?
- क्या अंतिम भूमि चयन हो चुका है?
- क्या वित्तीय स्वीकृति जारी हुई है?
- क्या कैबिनेट अथवा शासन स्तर पर अंतिम निर्णय लिया जा चुका है?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर सार्वजनिक रूप से स्पष्ट कर दिए जाएं, तो अधिकांश भ्रम स्वतः समाप्त हो सकते हैं।
क्षेत्रीय भावनाओं को टकराव नहीं बनने देना होगा
टिहरी सदैव संघर्षों और बलिदानों की भूमि रही है।
यही वह धरती है जिसने श्रीदेव सुमन जैसे महान जननायक दिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि नई टिहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच कृत्रिम विभाजन की रेखाएं न खींची जाएं।
मेडिकल कॉलेज चाहे जहां बने, उसका उद्देश्य पूरे टिहरी जनपद की सेवा होना चाहिए।
यदि यह विषय शहर बनाम गांव की प्रतिस्पर्धा बन गया, तो सबसे बड़ा नुकसान स्वयं टिहरी को होगा।
राजनीति की असली परीक्षा
2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है।
लेकिन यह विवाद निश्चित रूप से राजनीतिक वातावरण को प्रभावित करेगा।
विधायक किशोर उपाध्याय हों या कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल—दोनों अनुभवी जनप्रतिनिधि हैं।
दोनों के सामने अवसर भी है और चुनौती भी।
यदि वे संवाद स्थापित कर सर्वसम्मत समाधान निकालते हैं, तो जनता इसे परिपक्व नेतृत्व मानेगी।
यदि विवाद और बढ़ता है, तो राजनीतिक लाभ-हानि से अधिक नुकसान जनविश्वास का होगा।
सरकार को क्या करना चाहिए?
इस पूरे विवाद का सबसे सरल समाधान केवल पारदर्शिता है।
सरकार को चाहिए कि—
- मेडिकल कॉलेज की वर्तमान स्थिति पर आधिकारिक श्वेतपत्र जारी करे।
- अब तक की प्रशासनिक एवं तकनीकी प्रक्रिया सार्वजनिक करे।
- यदि अनेक स्थानों का परीक्षण हुआ है तो उसके मानदंड स्पष्ट करे।
- अंतिम निर्णय विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट एवं जनहित के आधार पर लिया जाए।
- निर्णय के पीछे वैज्ञानिक, प्रशासनिक और स्वास्थ्य संबंधी तर्क सार्वजनिक किए जाएं।
अंतिम बात
- टिहरी मेडिकल कॉलेज केवल ईंट-पत्थरों का संस्थान नहीं होगा।
- यह आने वाली पीढ़ियों की चिकित्सा शिक्षा, हजारों युवाओं के रोजगार, क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और विकास की दिशा तय करेगा।
- ऐसे में यह विषय राजनीतिक नारेबाजी से ऊपर उठकर तथ्य, पारदर्शिता और व्यापक जनहित के आधार पर तय होना चाहिए।
- जनता आज किसी नेता की जीत या हार नहीं देखना चाहती।
जनता केवल इतना जानना चाहती है—
“मेडिकल कॉलेज कब बनेगा, कहाँ बनेगा और किस आधार पर बनेगा?”
जब इन तीन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर मिल जाएंगे, तब शायद टिहरी भी एक स्वर में कह सकेगी—
“यह केवल किसी क्षेत्र की जीत नहीं, पूरे जनपद की जीत है।”
डिस्क्लेमर:
यह सम्पादकीय स्वतंत्र विश्लेषण, उपलब्ध सार्वजनिक सूचनाओं, जनप्रतिनिधियों के वक्तव्यों, विभिन्न पक्षों द्वारा व्यक्त विचारों तथा जनचर्चाओं के आधार पर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था, राजनीतिक दल अथवा जनप्रतिनिधि के पक्ष या विपक्ष में निर्णय देना नहीं, बल्कि विषय के विभिन्न पहलुओं को संतुलित रूप से प्रस्तुत कर स्वस्थ लोकतांत्रिक विमर्श को प्रोत्साहित करना है। मेडिकल कॉलेज की अंतिम स्वीकृति, स्थान चयन एवं प्रशासनिक निर्णय का अधिकार राज्य सरकार एवं संबंधित सक्षम प्राधिकारों के पास निहित है। यदि भविष्य में आधिकारिक तथ्यों या निर्णयों में परिवर्तन होता है, तो इस सम्पादकीय में व्यक्त विश्लेषण को उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
